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Friday, December 17, 2010

बस में दबंगई, सीट मिली तो Excuse me

कई फिल्मों में एक बड़ा अच्छा संवाद कहा जाता है की बस, ट्रेन और लड़की के पीछे नहीं भागना चाहिए एक जाती है तो दूसरी आती है पर मेरा मानना है भागो और भागना जरूरी भी है वर्ना ऑफिस में आप लेट हो सकते है या किसी की शादी में या जॉब के इंटरव्यू में भी लेट हो सकते हैं । और सच मानिए जो मज़ा भाग कर इन तीनो को पकड़ने का है वो किसी और चीज़ में नहीं । और ख़ास कर तब जब बस, ट्रेन और लड़की के पीछे आप भाग रहे हो और वो किसी कारणवश रुक जायें और आप लपक कर उसे पकड़, ले सच मानिये इससे बड़ा सौभाग्य कोई और नहीं है। इन सब में लड़की अपवाद है, अपवाद भी न कहे तो ठीक रहेगा । अगर एक अच्छी लड़की के पीछे भागे और वो मिल जाये तो सोने पर सुहागा वरना तो आपका जीवन भाग-भाग कर बीत जायेगा और आपको भागने पर खेद होगा । पर सच मानिए बड़ा ही अदभुत मज़ा आता है भागने में और लपक कर पकड़ लेने पर सुकून फ्री ।

पिछले कई दिनों में मेरे साथ ऐसा ही हो रहा है । दिल्ली में अभी सर्दी की शुरुवात ही हुई है और मेरी नींद सुबह खुलने में आलस दिखाने लगी है । मोबाइल का अलार्म रोज़ प्रातः आने समय पर बजता है पर मुझे उठाये बिना ही स्वतः बंद हो जाता है वो तो भला हो मेरी माता जी का जो उठ कर पानी गरम होने को लगा देती है और मैं फिर देर में जल्दी से उठा कर नहाता हूँ । अगर कहा जाये तो नहाने में भी कई विधायें होती है पर रोज़ समय के हिसाब से रोज़ उनका अनुसरण करता हैं और सप्ताह में एक बार कौवा स्नान का भी मौका मिलता है । ये एक विशेष प्रकार का स्नान है जो कम समय में किया जाता है । आगे में क्या कहू आप समझदार है जान ही गए होंगे ये किस तरह का स्नान है । खैर मैं जल्दी से स्नान कर के बस को पकड़ने के लिये निकल जाता हूँ । पता नहीं क्या हो गया है जब से सरकार में ब्लू लाइन पर रेड लाइट दिखाई है तब से DTC  में इतनी भीड़ क्यों हो गई है ।  बस की हालत देखता हूँ तो लगता है की सब के सब लेट है मेरी तरह । पर ऐसा नहीं होता एक बस में लिखा हुआ मैंने देखा था की कृपया जल्दी चलने के लिये न कहे क्योंकि आप लेट हैं हम नहीं । बस इसी ख्याल से में हमेशा ही चुप हो जाता हूँ और बस की रफ़्तार के साथ अपनी रफ़्तार मिला लेता हूँ ।
कई बार तो लटक कर यात्रा करनी पड़ती है और दिल्ली में तो नहीं हाँ पर कई बार जब अपने गांव में ऐसा करता था तो बस के पीछे लिखा रहता है की लटके तो गए, ड्राईवर को मत बताये

पर फिर भी मैं सीट पाने के जुगाड में रहता हूँ । क्योंकि मुझे अब थोड़े-थोड़े लोग जानने भी लगे हैं तो जब लटकता हूँ तो कोई बड़े प्यार से मेरा बैग ले कर अपने स्थान पर रख देता है और बड़े प्यार से २ शब्द कहता है संभल कर और मेरा मन बड़ा खुश होता है चलो दिल्ली जैसे शहर में लोगों को अनजान लोगों की भी चिंता रहती है ।

लटक-लटक कर जगह बनाते-बनाते एक एक पायदान पर उपर चढ़ते-चढ़ते दबंगई दिखाते हुए मैं अपने शिकार के बगल में घात लगा कर बैठने के लिये मैं उसके पास खड़ा हो जाता हूँ । सच मानिये ये सीट/कुर्सी का ही मोह होता है की मैं इतना कुछ करके, ये सब कुछ करता हूँ वो भी सिर्फ दिल के सुकून के लिये न की नेताओं जैसा धन के लिये ।

क्योंकि मुझे अब अच्छी तरह से पता है की कौन सी सीट कब खाली होती है । फिर जब इतनी मेहनत के बाद सीट मिले तो उसका मज़ा ही कुछ और है । सीट क्या कोई भी चीज़ के लिये आप इतनी मेहनत करे और जब वो आपको मिल जाती है तो उसका मज़ा ही कुछ और होता है । पर मेरे इस सुख पर पहले से कोई निगाह जमायें हुए थी या उसे पता था की मुझे ये पता है की कब कौन सी सीट खाली होगी। मैं जैसे ही बैठा वो भद्र महिला ने बड़े प्यार से २ शब्द कहे Excuse me क्या मैं बैठ जाऊ । अब तो मुझे काटो तो खून नहीं मैंने अब खड़े हो कर यात्रा करना ही उचित समझा और सारी दबंगई सलमान के लिये छोड़ दी। 

Tuesday, December 14, 2010

सगाई विशेषांक कविता

सोमवार को मेरे एक दोस्त की सगाई थी पर कुछ कारणवश जा ना सका तो  उसको ये एक तुच्छ सी कविता समर्पित करता हूँ और उम्मीद करता हूँ की वो अपनी शादी तक मुझे याद रखेगा और अपनी शादी का लड्डू मुझे
भी चखायेगा ........आगे की कविता प्रस्तुत है ......

सगाई विशेषांक

कुछ दिन खुशी से और जी लो
कुछ दिन खाना खुद पका लो
या उसमे थोड़ी बहुत नुक्स निकाल लो
कुछ दिन बिना बटन के शर्ट डाल लो
पुराना ही जुराब पैरों में चढ़ा लो
स्वेटर झाड़ कर नया बना लो
बिना नहाये खाना खा लो 
ब्रुश को भी जाले लगा लो
बिना पॉलिश के जूते चमका लो
घर के सामान को थोडा और फैला दो
अभी तो बस मंगनी हुई है जनाब
आपकी शादी हो जायेगी जब
तो इन सबके लिये दिल मचलेगा
और जब किसी को करते देखोगे, ऐसा तो
दिल पुराने दिनों के लिये तड़पेगा

सगाई की आपको अब लाख लाख बधाई
आपके याद में हमने ये कविता बनायीं
सब लोग मिल कर करो मेरा हौसलाअफजाई
क्योंकि इसके बाद मेरा नंबर है भाई
©csahab

Wednesday, December 8, 2010

तेरे अक्स कि तलाश में

तेरी खुशबू का अहसास
कर देता है मदहोश
तुझे महसूस करता हूँ फ़िज़ाओं में
हवाओं में, साँस लेते अहसासों में
जब तुझे उकेरता हूँ
कागज पर
क्यों नज़र नहीं आता
तेरा वो हसीन चेहरा
वो चमकती आंखे
वो जुल्फों का साया
वो गालों पर गहरा समंदर
वो मासूम मुस्कान
वो सुबह की पहली अंगड़ाई
जैसे पंक्षी उड़े आकाश में
सपनों को सोच कर मुस्कुराना
फिर उलझी जुल्फों को सुलझाना
नहीं खींच पाता
मैं तेरा अक्स कागजों पर
रंगीन कलमों से
देखा था तुझे रात में
बरसात के बाद में
तस्वीर कुछ धुंधली थी
अँधेरी रात में लिपटी थी
हवा के साथ उड़ता था आंचल
चेहरा था धुंध में श्यामल
सोचा कि तुझे बाँहों में भर कर देख लू
तुझे छू कर महसूस कर लू
पर तू हो गई आँखों से ओझल
आज भी उसी स्वप्न कि आस में सोता हूँ
हर वक्त तेरी सोच में होता हूँ
©Csahab

Saturday, November 27, 2010

चंद अल्फाज़ तेरे लिये

कुछ पंक्तियाँ बस के यात्रा के दौरान मन में हिलोरे ले रही थी सोचा लिख लू आज आपके सामने प्रस्तुत है आशा करता हूँ आपको अच्छी लगेगी। इसको लिखे के पीछे कोई निजी अनुभव नहीं पर हाँ देखे हुए जरूर है । 

वो कहते हैं बदनाम हो गया हूँ
उनकी गली में आम हो गया हूँ।

मेरा आना अब उन्हें नागवार गुजरता है
उनके रोशनदान का पर्दा नया लगता है।

छत के फूल भी मुरझाने लगे हैं
सीढ़ियों पर जाले लगने लगे हैं।  

देख कर हमें रंग बदलने लगे हैं
हम भी अब उन्हें भूलने लगे हैं।  

© Csahab

Tuesday, October 26, 2010

गंगा मैली यमुना मैली पर इंसानों के मन है चंगे

बहुत पहले की एक कहावत है की मन चंगा तो कठौती में गंगा । तब जब इसे कहा गया था तब शायद या तो यमुना का अस्तिव नहीं रहा होगा या फिर शायद उसमे कोई नहाता नहीं होगा । या एक कारण और होगा वो है की वो पाप नहीं धोती होगी । पर आज तो क्या गंगा क्या यमुना दोनों ही सिर्फ कपड़े धोने के काम में लायी जाती है । खास कर बड़े बड़े शहरों में चाहे वो कानपुर हो दिल्ली । उनकी हालत दोनों जगह बिगड़ी है ।

सरकार ने दोनों को साफ़ करने के नाम पर न जाने कितने करोड़ो रुपये पानी के नाम पे पानी की तरह बहा दिया । और वो पैसे अपनी की तरह बहते ही रहे पर फिर भी गंगा मैली यमुना मैली की मैली ही रही । कितने स्वयंसेवकों न इसी बहाने अपने वारेन्यारे कर लिए । शायद अब वो उस गंगा किनारे भी नहीं जाते होंगे जहाँ से उन्होंने शुरुवात की होगी । बस सफाई के नाम पर करोड़ो अंदर करने में खुद मैले हो गए पर गंगा साफ़ न हुई ।

कभी कभी लगता है की न जाने क्या सोच कर रीती रिवाज़ बनाये गए होंगे की घर की पूजा का सारा सामान अगर आप गंगा में डालेंगे तो पुण्य मिलेगा उनका मतलब शायद पोलिथिन से नहीं होगा । क्योंकि उस समय ये सुविधा उपलब्ध नहीं रही होगी अगर होती तो आज के नियम भी कुछ और होते । तब शायद गंगा का नाम भागीरथ हो रहता और वो आज इतनी पवित्र नहीं मणि जाती और न ही यमुना । हालाँकि गंगा को सबसे सबसे पवित्र नदी मन जाता है और पुरे भारत वर्ष में सबसे ज्यादा मान मिलता है । गंगा पर ना जाने कितनी फ़िल्में बनी हिट हुई और लाखों कमाएँ । पर गंगा को क्या मिला तारीख पर तारीख । हर साल गंगा को सफाई के लिए नई तारीखे मिलती है चाहे वो कोर्ट हो या मंत्रीमंडल या फिर श्रद्धालुओं के मन में गंगा सफाई के प्रति पूर्ण आस । एक बार जोश के साथ गंगा की कुछ घाटों की सफाई होती है साथ में एक गंगा आरती का गाना बनता है, योग बाबा थोडा भाषण देते हैं ताली बजती है थोडा साफ़ होता है 2-3 तक अखबार में सुर्ख्रियाँ बनती है और फिर वही पुनः मुश्को भवः वाली बात होती है । इतना कुछ होता है पर गंगा या यमुना साफ़ नहीं होती साफ़ होती है तो बस सरकार के जेब से मुद्रा, अखबारों से स्याही और व्यर्थ में किया गया श्रम । जिसके लिए खुद गंगा और यमुना अगर बोलती तो वो भी मना कर देती ।

बात ये है की एक और कहावत कही गई है की दान की शुरुवात घर से की जाती है तो मेरा मानना है की गंगा और यमुना की सफाई भी घर से शुरु करें । कम से कम पोलिथिन तो नदिओं या नालों में न फेंके और साथ ही घर में पेड़ पढ़ो की संख्या बढ़ाये या नये लगाये जिससे घर में निकलने वाला निर्वाल (पूजा पर चढ़े फूल ) उनमे डाले जा सके जिससे पेड़ के साथ साथ फूलों को भी समुचित विकास मिलेगा और हमें बेहतर घर । साथ ही मेरा पूजा के सामान बनाने वालों से अनुरोध है की सामानों पर भगवानों के चित्रों से बचे जिससे पूजा के बाद उन्हें कंही भी रखा और किसी को भी दिया जा सके । कुछ इसी तरह के नये ख्यालों से सरकार से द्वारा दिया गया हमारा ही धन गंगा की सफाई के साथ साथ न जाने कितने सुखाग्रस्त जगहों की प्यास बुझा सकता है । मैं अपने बस की यात्रा के दौरान देखता हूँ की पुल पर  से लोग न जाने क्या क्या फेकते रहते है जिनकी मदद के लिए बकायदा सरकार ने पुल की रेलिंग पर बने जालों को
कटवा रखा है जिससे सरकार के लिए किसी तरह की धार्मिक परेशानी न हो ।

विशेष : उपर जो भी लिखा है वो व्यक्तिगत राय और सुझाव है । पाठकों का सहयोग सम्मानीय है । 

Thursday, October 21, 2010

जींस की माया, बदल दी काया और स्टैंड पर भीड़ का साया

आज कल कुछ दिनों से दिन बड़े मासूमियत से गुज़र जाते हैं । पता की नहीं चलता की कब दिन गुज़रेगे और मुझे ऑफिस से घर जाना है और जब घर पर रहता हूँ पता ही चलता की कब रात कट गई, सुबह हुई और फिर ऑफिस जाने का मन नहीं करता है । पर प्रकृति का जो नियम है उसको आप कब तक पीठ दिखायेंगे कभी तो सामने आने होगा उसके यही सोच कर मैं रोज उसका सामना करता हूँ और देर से ही सही पर ऑफिस जाने की रोज वही तैयारी करता हूँ ।

इन सबके बीच मैंने एक चीज़ देखी की जब आपका मन किसी विशेष काम या जगह में नहीं लगता तो हर कोई उसी के बारे में ज़िक्र करता है । कभी-कभी कुछ लोग अनजाने में करते है, कभी कुछ जानबूझ कर करते है । पर अगर आप उसी चीज़ को आनंद में लेना शुरू कर दें तो सारी तरह की चर्चा खत्म हो जाती है ।

खैर मेरे बस का सफर जारी है और अब कॉमन वेल्थ भी खत्म हो गए हैं । पर उसको कराने वालों के पीछे अब खेल का खेल हाथ धो कर पीछे पड़ गया है । पर एक खेल में जहाँ कईओं के मुह बीप-बीप से बाहर गए वन्ही बहुत से लोगों को ब्लू लाइन बसों से बहुत राहत मिली । शीला जी ने भी दिल्लीवासियों को धन्यवाद बाद दिया की कॉमन वेल्थ में सहयोग देने के लिए शायद ब्लू लाइन बसों को पूरी तरह हटा लेना उसी का उपहार है । शीला जी ने सोचा की दिल्ली वाले भी याद करेंगे की बड़े दिल वाले मुख्यमंत्री ने ब्लू लाइन को हटा दिया या फिर इसके पीछे खेल पैसों का है जो दिल्ली के सरकारी बस ने खेलों के दौरान कमाए । पर कोई नहीं हो सकता है ब्लू लाइन बंद होने से रोज़ ना जाने कितने मोबाइल चोरी होने से बचे, ना जाने कितनी महिलाओं को रहत मिली होगी जो रोजाना मज़बूरी में ब्लू लाइन बस में न जाने क्या क्या सहती हैं ।

आज कल लड़कीयों मैं न जाने क्या फैशन का तडका लगा गया है ये सब पश्चिमी हवा है है आधुनिकता की नई परिभाषा । टीवी में जो कपडे आये नहीं वो अगले दिन आप किसी न किसी लड़की पहने देख सकते हैं । मेरे ख्याल से उनको भी अच्छा लगता है जब वो नये कपडे पहन कर निकले और लड़के पलट-पलट कर देंखे । ये उनकी सोच है और लड़के तो होते ही इस मामले में बेरोजगार, उनको  लागता है कोई उनको ऐसा ही कोई रोजगार दे दे । चाहे उनको तनख्वाह कम ही क्यों न मिले वो काम करने को तैयार हो जायेंगे ।
हुआ कुछ यूँ की मैं स्टैंड पर अपनी बस के इंतज़ार में खड़ा था । सामने एक बड़ी शालीन से युवती खड़ी थी जींस लगता था जैसे खाल से साथ सील दी गई हो । तभी सामने से एक स्कूटी आ कर रुकी, शायद वो उसकी कोई दोस्त होगी । दोनों साथ जाने की तैयारी करने लगी मुझे देख कर अच्छा लगा की दोनों हैलमेट पहन कर जाने की तैयारी में थी पर उसके बाद जो हुआ वो मेरे पुरे दिन की खुराक थी । ड्राईवर सीट वाली तो आराम से बैठ गई पर पिछली सीट पर जिसे बैठना था वो उस पर पहुच ही नहीं पा रही थी क्योंकि उनकी जींस इतनी टाईट थी की उनसे उस पर बैठाजी नहीं जा रहा था । उन्होंने सभी तरीकों से प्रयास किये पर वही ढाक के तीन पात । अब तो सबके सब देखने वालों के लिए ये एक खेल हो गया था । कुछ तो उनकी मदद करने भी पहुँच गए । कम से कम 15 मिनट की जद्दोजेहद के बाद ड्राईवर हो हटा कर पहले खुद बैठी फिर ड्राईवर वाली मैडम बैठी और साथ में २ लोंगो ने स्कूटी की संभाले रखा ।

मुझे लगा की इस तरह जींस तब इतनी परेशानी वाली है तब तो मैडम को दैनिक जीवन में न जाने क्या क्या देखन पड़ा होगा । पर बस स्टैंड जो हुआ उससे में उन दोनों नहीं भूल पाउँगा ।  

Friday, October 8, 2010

झक्की ड्राईवर सवारी परेशान

जब में छोटा था तो एक बात मेरे मामा ने एक बात कही थी “Every Place has a thing and every thing has a place” ये पूरी तरह से कितनी सही है ये नहीं पता । इस कहावत को याद आने का एक कारण है और उसे कहे जाने के कई । जब मामा ने कहा था तब हम छोटे थे अपना कोई सामान समुचित स्थान पर नहीं रखते थे, पूरे दिन तो नहीं हाँ आधे दिन तो मस्ती जरूर करते थे । और घर वाले आधे दिन सामान को ठीक करने में गुजार देते थे । तब मम्मी की डाट में भी बाद अमाज़ा आता था तो कभी कभी बेलन के प्यार फ्री मिलते थे । और हमारी ही रोटी बनती थी । आंसुओं के साथ रोटी भी नमकीन लगती थी । फिर कभी मामा का प्यार और साथ में माँ का दुलार तो था ही । वो कहावत तब सुनी और आंसुओं से साथ यादों की तरह बह गई ।

इस कहावत का दूसरा पहलु ये है आज हम बड़े हो गए और बस में चलते है जहाँ भिन्न भिन्न प्रजाति के लोग भी आपके साथ चलते है और उनकी अदा भी जुदा होती है । ऐसे ही मुझे यदा कद मिलते रहते हैं अब ३-४ पुरानी बात है है में सुबह घर से बस के लिए निकला शायद मुझे थोड़ी देर हो गई थी । और में झक मार के सरकारी बस में ही चढ़ गया । ड्राईवर कोई 35 से ज्यादा उम्र का होगा और अनुबंधित था । ये उसकी चल से लगता था । मुझे एक बात समझ में नहीं आती की जो लॉन्ग सरकारी नहीं होते है वो सरकारी काम काज को बहुत बीप बीप करते है पर जब उसका हिस्सा बनते हैं तो वो भी वही करते हैं ऐसा मुझे उस ड्राईवर को देख कर लगा । वो इसके पहले शर्तिया किसी निजी कंपनी में ड्राईवर होगा पर वहां ऐसी गाड़ी नहीं चलता होगा इसका मुझे विश्वास है । पूरी सड़क खाली होने के बाद भी वो गति पे कभी भी गति नहीं दे सका । और तो और उसके कुछ अजीब नियम थे । मसलन गेट खाली रहे , शीशा के आगे किसी का बाल भी ना आये , डैशबोर्ड खाली रहे । उसको देख कर मुझे अपने मामा वाली कहावत याद आ आ गयी । बस की भीढ़ को नहीं देख रहा था, वो सिर्फ खुद को देख रहा था । मुझे लगता है अगर इसी तरह वो अगर निजी कंपनी में होता तो भी उसका यही व्यवहार होता या वो सवारिओं के साथ तन्मंता के साथ गाड़ी को चलाता । या ये सब उसके सरकारी विभाग से जुड़ने का नतीजा था । क्या पद आपके स्वाभाव या सोचने के लिए काफी है या आप कभी उससे उपर भी जा सकते हैं । क्या यही वो सोच है जो सरकारी और निजी कर्मचारी को प्रथक करती है । उसके काम करने का तरीका । और क्या वो जब तक सरकारी अनुबंध पर है वो इसी तरह से गाड़ी चलाएगा और जब वो निजी कंपनी में जायेगा तो पुनः पहले की भांति रफ़्तार से चलेगा । यही ख्याल मेरे मन में लगातार अंत तक रहा क्योंकि उस दिन उस ड्राईवर के इस तल्ख़ रवैये केकारण कई लोगों की बस छूटी । और न जाने कितने लोग ऑफिस जाने से महरूम रह गए होंगे । शायद किसी का इससे ज्यादा नुक्सान हुआ होगा ।

Thursday, September 30, 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स के चक्कर में, लड़का शिकार हो गया लड़की की टक्कर में

कॉमनवेल्थ गेम्स से सरकार को उतना फायदा नहीं मिला होगा जितना कष्ट आम जनता को हुआ होगा  बसों की हालत खराब है यात्री बेहाल हैं और सरकार लाइलाज है । जैसे जैसे कॉमनवेल्थ गेम्स की तारिख पास आ रही है वैसे वैसे आम लोंगो की दिक्कत बढती जा रही है । हालाँकि इसके दूरगामी परिणाम अच्छे होंगे पर अभी तो लंका लगी हुई है ना । बाद का क्या हम हो न हो दिल्ली सवर गई तो क्या, हमें तो कष्ट हो रहा है ना ।  ऐसा कई लोग बार बार लगातार सोचते हैं न जाने दिन में कई बार पर कर कुछ नहीं पाते ।

कॉमनवेल्थ गेम्स के कारण ब्लू लाइन बसों को बंद करा दिया है और सरकारी बस सरकार की तरह सुस्त और फुस्स है ।  कब चले और कब रुके कुछ पता नहीं। जो बड़ी बस आयीं है वो भर जाने पर इस तरह से चलती है की पूछो मत ।  उनमे जगह कम और भोकाल ज्यादा है ।  खैर उनके इंतज़ार में न जाने कितनी देर खड़ा होता हूँ स्टैंड पर, पर वो नहीं आती बस उसकी आस आती है और आस पे साँस चलती है और साँस को थाम कर में किसी भी बस में चढ़ जाता हूँ जो मेरे गंतव्य स्थल पर जाती हैं और दिन की शुरुवात बस में धक्के खाने के साथ करता हूँ ।

और आज कल अंत भी उसी के साथ करता हूँ क्योंकि वापसी में बस तो नदारद रहती है । बस स्टैंड पर भीढ़ इतनी की ना जाने कहाँ से 5-6 खोमचे वाले रोज कुछ न कुछ बेचते नज़र आते हैं और सच मानिये स्टैंड पर खड़े लोगों से ज्यादा भूखे लोग मैंने कभी नहीं देखे । खोमचे वालों का सब कुछ खत्म कर देते हैं ।  हम लोगो को यात्रा के नाम पर बहुत भूख लगती है । मैंने देखा है कितनी भी महगाई आये पर खाने के सामान में कोई कमी नहीं होती जो चीज़ जितनी महगी होती है वो उतनी ज्यादा बिकती है और खाते हुए हम सरकार की न जाने कितनी पुश्ते गिन जाते हैं ।

रात में ऑफिस से घर जाते वक्त किसी तरह घर जाने की जिद होती है पर इसमें कोई कोई हमसे भी ज्यादा जिद्दी होते हैं । मसलन कल एक जनाब मिले वो शाम के 6 बजे से एक विशेष नंबर की बस के इंतज़ार में खड़े थे और जब में स्टैंड पर पंहुचा तो 8 बज चुके थे । पर वो जनाब किसी और बस में जाने के बजाए उसी के इंतज़ार में थे उनके बस का नंबर और मेरे बस का नंबर एक ही था तो मैं हालत समझ गया और अपनी यात्रा टुकड़ों में करने की सोची और घर जाने के सीधे क्रम को 3 हिस्सों में बाँट दिया ।
पहला हिस्सा 4 किलोमीटर का था जो कम देर चला और बस से उतर कर दूसरे क्रम की बस में चढ़ गया । बस में सवारी इस कदर भरी हुई थी जैसे बोरी में चीनी भर के हिला दिया गया हो और फिर से चीनी डालने की तैयारी हो बस जब स्टॉप पर रूकती थी तो हर कोई यही मनाता था की बहुत लोग उतरे और कोई न चढ़े । बस फिर से चली पर रुक गई देखा एक सामान्य कदकाठी की लड़की एक लड़के को बेतहाशा रूप से मार रही थी । वो दोनों उसी बस से उतरे थे जिसमे में था । मुझे लड़की की फुर्ती देख कर बड़ा अचम्भा हुआ उसने कोई 5 सेकेंड में 10 तमाचे मार दिए होंगे जिसकी मुझे क्या उस लड़के को भी उम्मीद नहीं होगी उसके बाद तो हीरो की लिस्ट बड़ी लंबी होती गई सब उसकी मदद में हीरो बनने के लिए आगे आ गए । लोगो का कहना था की लड़की को टक्कर लग गई थी लड़के से, बेचारा बिना बात के कॉमनवेल्थ गेम्स का शिकार हो गया और बस आगे बढ़ गई ।  

Thursday, September 23, 2010

बस में भीड़ और विज्ञापन का असर साथ में कॉमन वेल्थ फ्री




आज कल जिधर देखो खुदा ही खुदा है, मैं दिल्ली के रास्तों की बात कर रहा हूँ । आप जिधर देख लो हर तरफ खुदा है और उसमे पानी भरा हुआ है और साथ में वो मच्छर प्रजनन स्थल बने हैं । और उन्हें मीडिया बड़ी ही तन्मंता के साथ दिखा रहा है । मैं भी कभी कभी मान बहलाने के लिए इंडिया टीवी देख लेता हूँ और मीडिया की हरकतों पर  मुस्कुरा लेता हूँ । पर क्या करे अगर, अगर क्या इतना पानी है की मगर भी रह जाये तो किसी को पता नहीं चलेगा । कोई भी दिल्ली वासी का पेट तब तक नहीं भरता होगा जब तक वो कॉमन वेल्थ वालों के खानदान को अपनी जवाब पर ना लाता हो । घर का पानी ना आये तो कॉमन वेल्थ की बीप बीप, पंचर भी होता है तो मैं कईओं को कॉमन वेल्थ की बीप बीप करते देखा है । अरे भाई उसमे वेल्थ वालों की क्या गलती वो तो बस अपना काम कर रहे हैं । आजकल हर जगह कॉमन वेल्थ की ही चर्चा है । मेरा एक रिश्तेदार भी इसका हिस्सा है और वो बड़ा प्रसन्न है क्योंकि उसे उपर से नीचे तक रीबोक के बस्त्रों से सजाया गया है ।

मेरा भी पाला कॉमन वेल्थ से होने वाली परेशानिओं से पड़ा है क्योंकि में बस का नियमित सवारी हूँ और कॉमन वेल्थ की वजह से मुझे भी या मेरे जैसे कई नियमित लोगों को परेशानी हुई है । मसलन कभी एक नया रूट बना देना कभी किसी नए रास्ते पे ले जाना । देर से ऑफिस पहुचों तो रोज नई बात बताने से ऑफिस वालों का भी शक होना की बालक रोज लेट होता है और कहानी भी नई बनाता है या तो ये बहुत क्रिएटिव है या बहुत ही बड़ा कहानीकार । पर सच तो ये है की सच वही जनता है जो बस का सफर करते हैं, हमारी पीड़ा वो क्या जाने जो खुद के वाहन या कार से आते हैं ।

वो तो जहाँ खड़े हो जाये वंही पर एफम ऑन और फोन पे लगे बतियाने । पर बस वाले क्या करे एक तो बस में भीड़ उस पर से खड़े खड़े सफर और अगर बस में आप अपने पैसे खर्च कर के भी बात करेंगे तो भी कई लोग टोक देते हैं की भाई साहब बस में तो अराम करने दिया करो फिर तो दिन भर फोन पर ही बात करना है । ये हैं बस के हालात । कुछ लड़किओं को मैंने देखा है उनके मुंह में साईंलेंसर लगा होता है कितना भी ध्यान लगा लीजिए मजाल की आप उनकी बात सुन सके ।

अब कल की ही बात है सुबह का समय था हर कोई भागने में, और बस पकड़ने में लगा हुआ था । मैं भी भीढ़ का एक हिस्सा था । बरसात का ये किस्सा था । जब से बस में फोन चोरी हुआ तब से ब्लूलाइन की सवारी से बचता हूँ, थोड़ा अराम से बस पकड़ता हूँ । एक सरकारी गाडी आई वो भी पूरी ठसाठस भरी हुई । किसी तरह उसकी बालकॉनी वाली सीट ( ड्राईवर के बगल वाली क्योंकि यही वो स्थान है जिसे पूरी बस दिखाई देती है तभी में इसे बालकॉनी वाली सीट बोलता हूँ ) पर जगह मिली । और मैं ड्राईवर साब से बाते करता हुआ सफर को अंजाम देने लगा । अभी बस अपनी रफ़्तार पर थी की अचानक किसी महिला के शोर की आवाज़ आई, आवाज़ का जब ठीक से अध्ययन किया तो पता चला की कोई नवयुवती होगी । उसके साथ उसका कोई पुरुष मित्र भी था । उसके बाद तो अगले १५ मिनट तक सिर्फ हो हल्ला ही होता रहा बात क्या थी पल्ले ही नहीं पड़ रही थी । हम भी ड्राईवर साब के साथ मगन थे । एक जनाब जब पीछे से आगे तो मैं बड़े प्रेम से पूछा क्या मैटर था, तो जनाब बोले भाईसाब बस में इतनी भीढ़ है  गलती से किसी ने एक नवयुवती को छू दिया होगा तो उस पर उनके पुरुष मित्र तो ताव आ गया । तो पूरा मुद्दा मेरे समझ में आ गया । वैसे भी आज कल रेडियो और टीवी में नया विज्ञापन बड़ा चल रहा है की वो प्यार ही क्या जो आपकी रक्षा ना कर सके गुनाहों का देवता । चलो कम से कम विज्ञापन का असर इतनी तेज़ी से होता है ये मैंने बहुत दिनों के बाद देखा था । मैं भी अपने स्टॉप से ऑफिस के लिए निकाल पड़ा ।   

Thursday, September 16, 2010

चन्द्र शेखर आज़ाद को समर्पित एक कविता

आज कुछ लिखने का नहीं बल्कि गुनगुनाने का मन किया तो सहसा ही पता नहीं कहाँ से चंद्रशेखर आज़ाद याद आ गए और उनपर मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखी है उनको आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ आशा है आपको पसंद आएगी


देश को आज़ाद कराने,
की ज़िद जिसने ठानी थी
उठा कर बन्दूक चलाकर कर गोली,
लिखनी नयी कहानी थी
भगत बिस्मिल के साथ,
ना जाने कितनी खाक छानी थी
कभी इस शहर कभी उस गाँव में,
जीवन जीना जिसकी निशानी थी
मार खाते हुए नाम आज़ाद
बताना उनकी साहस बयानी थी
पहन कर साधू का चोला
चकमा देना पुलिस को भी हैरानी थी
बाग में जब खुद को घिरा पाया
तो आखिरी गोली खुद पर चलानी थी
आज़ाद हुआ जीवन से आज़ाद जब
पूरे देश में ये चर्चा जुबानी थी  
© विपुल चौधरी 

Saturday, September 11, 2010

अब हिंदी में छा जाना है

सभी मित्रों और बंधुजनो कों प्रणाम

मैंने कुछ दिन पूर्व ही ये मंच ज्वाइन किया है और कुछ ही दिनों में मुझे इससे बहुत कुछ सिखने मिला . जिससे मुझे एक नया मार्गदर्शन मिला।

जिसके फलस्वरुप मेरा ५ महीने पुराना ब्लॉग(Nayadinnayikahani.blogspot.com) बहुत अच्छी तरह से चल गया और मुझे एक अंतर्राष्टीय  संस्था ने अपने हिंदी के ब्लॉग का एडिटर बना दिया है। http://worldlanguagecommunications.com/

हमारा उद्देश्य हिंदी सम्बन्धी लेखो को और आगे ला जाना है और साथ में हिंदी साहित्य कों एक नया मुकाम देने का है।

उनका उद्देश्य हिंदी में अधिक से अधिक साहित्य कों बढ़ावा देना है और साथ में अधिक से अधिक भारत में हिंदी अनुवाद कों भी आगे ले जाना है जिससे वो भविष्य में इंडिया में जॉब के अच्छे अवसर प्रदान कर सके ।
मेरा आपसे अनुरोध  है की आप भी अपने हिंदी साहित्य से सम्बंधित लेख, अनुभव और ज्ञान हमारे साथ बांटिये
हम आपके नाम के साथ आपका लेख छापेंगे और अगर आप ब्लॉग लिखते हैं तो आपके ब्लॉग का लिंक भी देंगे

फिलहाल ये पूरी तरह से निशुल्क रहेगा अर्थात लेख लिखने का कोई शुल्क नहीं मिलेगा

मेरा उद्देश्य इसके पीछे हिंदी कों अधिक से अधिक आगे ले जाना है ताकि दूसरे देशो में भी हिंदी कों बढ़ावा मिले .......

जिस कंपनी के साथ मैं  जुड़ा हूँ वो यू.एस.ए में अनुवाद के क्षेत्र में है और भारत कों अपने प्रभावी देशो में देखती है। ये गठबंधन हम दोनों और हम सबके लिए अच्छा साबित  होगा। ऐसा मुझे विश्वास है।

मैं आपके भेजे हुए लेख से शुरुवात करना चाहता हूँ और लेख के इंतज़ार में हूँ

लेख क विषय हो सकते है - अनुवाद , भाषा के सम्बन्धी , भाषा , भाषा रूप,  अनुवाद का व्यापारिक महत्व
लेख भेजने के लिए आओ मुझे ईमेल कर सकते है csahab At ymail.com 

Monday, September 6, 2010

बस में मैं भी हुआ शिकार, जुदा हुआ यादों का संसार

मुझे बस में यात्रा करते हुए कोई 2 दशक से थोडा कम ही हुआ होगा बस इतने सालों को ब्लॉग के जरिये समेट पाना थोडा मुश्किल काम है पर में इसे लगातार लिखने का प्रयास करता हूँ ताकि धीरे धीरे ये इतने साल महीनो में बदल जाये और मेरी आदत लग जाये । ब्लॉग लिखेने की शुरुवात एक मजाक मजाक में हुई थी पर अब ये थोड़ी थोड़ी आदत में बदल गयी है । अब ब्लॉग लिखें में मज़ा आता है और शब्दों का विस्तार भी होता है । जिससे मुझे लगातार लेखन में मदद मिलती है । कुछ हाफ़ पतलून वाले मित्र पढ़ भी लेते है और थोड़े अनजान कमेन्ट भी कर देते है । जब कोई ब्लॉग पर कुछ लिखता है तो बड़ा मज़ा आता है और जब कोई मेरे ब्लॉग पर कुछ टिप्पणी करता है मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित करता है जिससे मैं थोडा और अच्छा लिखू ।

बस के इतने सफर में मैंने बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ लिखा । आज जो लिखूंगा वो थोडा हास्यप्रद और थोडा गुदगुदाने वाला होगा । कभी आपने चोर पे मोर वाली कहावत सुनी है अगर नहीं सुनी तो आज सुन भी लीजिए और पढ़ भी लीजिए । बात शनिवार की है जगह मेरे घर के पाससस तो नहीं हाँ उस स्टैंड की जरूर है जहाँ  से में रोज बस पकड़ता हूँ । मेरे पास 2004 मॉडल का नोकिया 1112 फोन था जिसपे मेरे सारे घरवालों की निगाह थी क्योंकि मेरा फोन मेरी तरह बेशर्म था पिछले 4 सालों से ना खराब हुआ था ना किसी ने उसे चोरी करने का साहस किया तो उसे भी खुद पे बड़ा घमंड था और साथ में मुझे भी था क्योंकि शायद ही किसी के पास कोई मोबाइल इतने समय तक चला हो । उसे रखने का एक कारण और था उससे जुड़ी यादें । जिन्हें मैं बड़ी ही नजाकत से सम्भाल कर रखे हुए था उस फोन ने हर सुख में और हर दुःख में मेरा साथ दिया था । न जाने कितनी बार किसी के हाथ में जाने के बाद भीनी सी खुशबू ले कर वापस आया था वो फोन(बैज्ञानिक उसे  बैक्टीरिया बोलते हैं ) ।  सच कहू तो मुझे ये याद नहीं की वो फोन मेरे पास कैसे और किस कारण से आया था । पर वो फोन मेरे बहुत करीब था । बहराल रोज की तरह मैं बस का इंतज़ार कर रहा था । उस दिन में ऑफिस जाने में लेट बहुत लेट था क्योंकि शनिवार था और शुक्र की रात में 1 बजे तक काम हुआ थ ऑफिस में तो देर से जाने का हकदार था । आज मुझे नयी बस से जाना था क्योंकि उस रोज मेरी रोज वाली बस का समय नहीं था । पता नहीं क्यों बस में आज भीड़ थी पर जब अंदर चढा तप पता चल की बस के गेट को 2-3 लोगों अजीब तरह से घेर रखा है ना कोई आगे जा पा रहा है ना पीछे । तभी मुझे शक हुआ और मैंने अपना मोबाइल चेक किया । जेब में अपने मोबाइल को महसूस कर के बहुत अच्छा लगा पर मेरा विश्वास भी भी दूर नहीं हुआ था पर पीछे से आई भीढ़ ने मुझे जबरन आगे आने पे मजबूर कर दिया और मैं आगे बढ़ गया । पर मेरा ध्यान मोबाइल से हट गया । यंही वो गलती थी जो मुझे नहीं करनी थी पर क्या करता । जो होना था वो हो गया । जेबकतरों के ग्रुप ने मेरा मोबाइल निकाल लिया था । और अब तक मुझे पता नहीं था चूँकि बस में भीड़ थी तो मेरा ध्यान भी गया । पर चोरों ने काम लगा दिया था । जब बस 2 स्टॉप पार कर गयी तो मुझे मोबाइल के चोरी होने का अहसास हुआ । फिर जो होना था वो हो चुका था मेरी यादों का उड़नखटोला उड़ चुका था । अब मुझे कभी कभी बड़ा दुःख हो तो कभी संतोष क्योंकि में मुझे थोड़ी खुशी भी थी थोडा गम भी । खुशी इस बात की थी की मैं अब नया फोन खरीदूंगा और गम इस बात का की आखिरकार मेरी यादें मुझसे जुदा हो गयी जिन्हें मैंने बड़ी जतन से संभल कर रखा था । बस से उतर कर मैंने सबसे पहले पुलिस को सूचित किया । और नए मोबाइल की खोज में लग गया । अभी भी मेरा विश्वास है की चोर उस बस को दुबारा शिकार जरूर बनायेंगे ।  अब कोई कैमरा वाला फोन लूँगा ताकि उन चोरों की पिक्चर ले कर पोस्ट कर सकू ताकि बाकी लोग भी सावधान हो सके । नोकिया का x2 फोन अच्छा है उसके आने के इंतज़ार में हूँ । 

Wednesday, September 1, 2010

अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

आप कभी कभी चाह कर भी कुछ नहीं लिख सकते क्योंकी आपका मन नहीं लगता है । कुछ करने में बहुत कुछ सितम सेहना है । इतने दिनों से ब्लॉग से दूर हूँ पर सच मानिये मन से नहीं तन से मजबूर हूँ ।  दिल हमेशा सही कहता है ये हर शायर कहता है । वैज्ञानिक दिल छोड कर दिमाग की बात मानने को कहता है । पर हमारे के पास दोनों रहता है । वक्त के साथ दोनों की बात मानते है और दिल बच्चा है कह कर दिल और दिमाग को शांत करते है ।

बात पिछले रविवार की है बहुत दिनों के बाद बाइक की सवारी लेने का मौका लगा  क्योंकि उस दिन रविवार था । पर अकेले जाना का सुख हमें नहीं प्राप्त नहीं था नाना जी साथ मेरे साथ था । वर्ष उनके ८० है शुद्ध दही की बनी लस्सी है । चम्मच से खाने जितने गाढ़े हैं तभी तो आज भी सबके प्यारे हैं । उनको ले कर कम से कम २०० किलोमीटर की यात्रा करनी थी । वो भी बस दिल्ली के अंदर करनी थी । माथा मेरा सुबह से खराब था थोड़े रास्तों से में अनजान था । मैंने भी हेलमेट सर में लगाया एक कनटोपा नाना जी को भी थमाया । नाना जी देख कर चौके, मैं कहा पहनो नहीं तो किसी और को पकड़ो । फिर दोनों का काफिला चल पड़ा हर गड्ढे के बाद नाना के मुह से मारा गया राम फूट पड़ा । कॉमन वेल्थ के चक्कर में नाना जी का हेल्थ डोल गया पूरा बुढा  शरीर झोल गया । हमने अपनी यात्रा फिर भी ना रोकी और काफिला फिर भी चलता गया । रास्ते में कुछ अजीब अजीब प्राणी से मुलाकात हुई । हालाँकि उनसे मुलाकात २० सेकंड से ज्यादा नहीं थी । पर वो कुछ दिल और दिमाग में छाप छोड गए । मैंने एक ठेठ हरयाणवी से पता पूछा उसने साथ में ४-५ और बता दिए- तू ऐसा कर सिद्धे चला जा आगे से मोड पे शर्मा जी मकान अयेगा उसे बाद अपने भतीजे का फिर एक का और आयेगा तू उसके बाद की रोड पे मुड जाना और फिर किसी से पूछ लेना । मुझे इतना गुस्सा आया गुस्सा पी के मैंने सारा गुस्सा गति बढ़ा कर निकाला । आगे एक रिक्शे वाले से पता पूछने का ख्याल दिल में आया बाद में उस ख्याल पर बहुत से जातिवाचक शब्दों से उसका अंत करवाया- भैया ये फलां पता बताओगे । उसके अंदर कस्टो मुखर्जी का साया पाया । ये पता तो मुझे मालूम है क्या तुमको यंही जाना है पर क्यों जाना है क्या बाइक से जाना है तुम दोनों  को जाना है । उसके आगे सुनने से पहले में कुछ और नहीं सुन पाया और गाड़ी को आगे बढाया । जिनके वहाँ जाना था उन्ही को फोन मिलाया तब जा कर सही पता पाया । उनके मिलने के बाद मैं कंही और जाने का प्लान बनाया पर नाना जी का प्लान पहले से बना था जो उन्होंने मुझे सुनाया । मैंने भी आज खुद को पक्का भक्त बनने का ख्याब सजाया और नाना जी को बैठा कर फिर वाहन को द्रुत गति से दौड़ाया । आगे फिर रास्ता पूछने का दुस्साहस दोहराया ।
बाद में फिर यही सोचा की मुझे आज ऐसा ख्याल फिर क्यों आया । जनाब को किसी चीज़ की जल्दी नहीं थी उल्टे हमें राय देने में अपना समय बिताया । आपका जहाँ जाना है वो जगह यहाँ से दूर है एक बार और सोच लीजिए । मैंने कहा अब निकल गया हू तो जाना ही है कितने किलोमीटर होगी । २ मिनट मंथन से बाद ५ किलोमीटर मुह से निकला और जाने का सबसे लम्बा रास्ता बताया । गंतव्य स्थल पर जैसे तैसे पंहुचा पर उन सबका आभार व्यक्त करने से डरता हूँ आज बस इतना ही लिखता हूँ । 

Saturday, August 7, 2010

सुबह सुबह शिव के दर्शन, चलती बस में कीर्तन

क्या सोचू क्या लिखू  कभी कभी खुद से यही पूछता हूँ । खुद से कभी कभी । जवाब वही आता है जो लिखें वाला हूँ चुप चाप जो मन में आये लिखे जायदा पका मत
सच में यही वो ख्याल है जब में थोडा ज्यादा ही सोचने लगता हूँ । तो प्रयास कम ही करता हूँ । मैं अपनी रोज ही जिंदगी रोज जी रहा हूँ । रोज कुआँ खोदता हूँ रोज पानी पीता हूँ । क्या मज़े है अपनी पीने का ।

यही सोचता हुआ ऑफिस के लिए रोज घर से निकलता हूँ ।वही बस में पुराने चेहरे , वही टिकेट काटने वाला वही गाते पर खड़े रहने वाला , वही बस की सबसे आगे की सीटों पर रोज बैठने वाली महिलाये(कुछ बालिकाएँ भी) वही रोड वही रास्ते । सोचता हूँ कब तक यूँ ही चलता जाऊंगा, कब जा कर विराम पाउँगा । इस रोज रोज झान्जह्त से कब में मुक्त हो पाउँगा ।

नित कुछ नया करने के उद्देश्य से नेट पर मेल चेक करता हूँ और कुछ नया ना पा कर फिर काम में लग जाता हूँ । काम का भी वही हाल है , मेरे से बुरा उसका हाल है । वो भी मेरे पास आ आ कर थक गया है उसे भी किसी और की दरकार है । बिना बात के काम है काम के काम है उसके बाद थोडा आराम है । पर कभी कभी उस आराम में भी थोडा काम है । और तो और आराम भी एक काम है ।

यही सोचता हूँ और काम कम आराम ज्यादा करता हूँ । चलो थोड़ी बस की बात हो जाये । बात थोड़ी पुरानी है बस में खड़े खड़े सफर कर रहा था की तभी कीर्तन की आवाज़ आई हरे कृष्णा हरे राम राम राम कुछ ऐसा ही था । मुझे ध्यान आया की यार रास्ते में तो ऐसा कोई मंदिर है नहीं जहाँ के भक्त इतने बहकती करने वाले हों । तभी बगल से सरकारी बस का द्रश्य साक्षात् दर्शन हुए और सारे के सारे ख्याल हकिकत में बदल गए । बस के पीछे वाली सीटों पर पूरी की पूरी कीर्तन मंडली बैठी थी । मेरे ख्याल से सरे के सारे एक ही ऑफिस के या एक ही कॉलोनी के रहे होंगे । वो पूरी तरह से तैयार खिलाड़ी लग रहे थे । क्योंकि वो ढोलक , मंजीरे और करताल से सुसज्जित थे । पूरी बस उस कीर्तन का आनंद ले रही थी । और सुनने वाले भी या कहे तो साथ चलने वाले भी । पर बस के अंदर या ये द्रश्य देखें में बड़ा ही अजीब लग रहा था पर आँखों और कानों  को उनके कीर्तन सुकून बड़े दे रहे थे । और अंदर से एक ही पुकार आ रही थी की चलो कम से कम दिल्ली जैसे शहर में ऐसा नज़ारा देखा जहाँ पर शायद दर्शन उनके दुर्लभ होते हैं जैसे दिल्ली में हैंडपंप । दुर्लभ से मेरा मतलब मंदिर से नहीं इंसानियत से है । मुझे उन भक्त जानो पर बहुत ही जायदा खुशी हुई की कैसे उन्होंने समय का सदुपयोग किया । आज कल के समय में हमें पूजा पाठ करने का टाइम नहीं होता । मैं बस से देखता हूँ की बहुत लोग कार के अंदर ही पूजा करते हैं । जूते उतार कर कार में ही हनुमान चालीसा या जो भी उनके इष्ट देव हो उनको याद कर लेते हैं । बड़े शहर में हर कोई समय का सदुपयोग करने में लगा है । कोई अखबार ले कर ही सुबह शौचालय में चला जाता है पूछो तो कहता है यार अंदर क्या करूँगा इसी बहाने अखबार भी पढ़ लूँगा। समय भी बचेगा मुझे ये समझ में नहीं अत है की एक साथ दो काम कैसे कर लेते हैं लोग वो भी निहांत एकाग्रता वाली जगह पर जन्हा पर कोई आवाज़ भी दे दे तो पूरी की पूरी मेहनत बेकार हो जाटी है । और नए सिरे से प्रयास करने होते है । अरे क्षमा चौंगा की बस की बात से पता नहीं कहाँ खस पे चला गया ।  

Wednesday, July 21, 2010

बस में वियाग्रा गुरु का व्याख्यान, सफर में हुआ आराम

बात को २-३ दिन बीत चुके हैं । मुझे नहीं पता ये २-३ दिन मेरे किस तरह बीते हैं ।  समोसे वाली घटना के बाद में बड़े ही संभल कर बस में सीट चुनता हूँ । वक्त शाम का था ऑफिस से जाते हुए मैंने उस दिन समोसे के बजाय भुट्टे को प्राथमिकता दि । दिल्ली के भुट्टों में वो मज़ा नहीं है जो कानपूर के भुट्टों में में । वो कहते हैं ना दुधिया भुट्टा मैंने दिल्ली में बिकता नहीं देखा । दुधिया भुट्टे की बात ही निराली है क्या मुलायम दाने, नमक से साथ मुह में पानी की तरह घुलते है । बस में भुट्टों की महक ,में खो सा गया था । उसके बाद बस खाली मिली तो रहत भी मिली । मैं एक सीट पर चिपक कर बैठ गया । २-३ स्टॉप के बाद बस में थोड़ी भीढ़ हो गयी । जिससे लोगों की तादाद बढ़ गयी और वो पास पास आते चले गए । मेरे पास जो बस में खली जगह होती है वहाँ पर २ सज्जन से दिखने वाले व्यक्ति आ कर खड़े हो गए । दिखने में तो वो बड़े ही सज्जन पुरुष प्रतीत हो रहे थे पर ५ मिनट बाद प्रतीत से प्र हट गया और उनके तीत बहार आने लगे । उनमे से एक व्यक्ति तो बाबा वियाग्रा दास निकले । उनके पास हर मर्ज़ की दवा थी । जो अपने कई बार दीवारों पर देखा होगा पर कोई देख ना ले एस डर से जायदा नहीं देखा होगा या तेज़ी से पढ़ लिया होगा । उनके साथ वाला चाहे किसी भी बात पर बात करे बाबा उसमे एक शक्ति वर्धक दवाई जोड़ देते थे । और उनका निशाना बिलकुल सही जाता था । उनके पीछे उनके ही तर्क थे जिससे उनका सामने वाला पूरी तरह से संतुष्ठ हो जाता था । पता नहीं या तो वो पूरी तरह से नादान था या तो बाबा की भक्ति में लीन भक्त । वो उससे उस शक्ति वार्धर दवा के कई सच्ची कहानियाँ एक के बाद एक कर के सुना रहे थे और उनका बहकत बीच बीच में अपनी जिज्ञासा भी शांत कर रहा था की गुरु जी ऐसा क्यों होता है इसका कारण क्या है । और बाबा बड़े ही तन्मंता से उसकी बात का जवाब देते थे । उनकी बातों से मुझे लगा की बाबा का एक एक खानदान वासी उस शक्तिवर्धक दवा का ही परिणाम है । क्योंकि उनके अनुसार छोटा हो या बड़ा, साडू का बेटा हो या भाई का , या फिर बहिन का  सब बाबा की दि हुई चमत्कारी दवाई के बल पर आज अपना नाम रोशन कर रहे हैं । वर्ना उनकी क्या मजाल की वो किसी लायक थे । पर बाबा में उनकी इस समस्या को तुरंत जाना और हल बाता कर उसका वैवाहिक जीवन तबाह होने से बचा लिया । और तो और उनका साफ़ कहना था की पुरुष अगर बिना उस दवाई के कुछ नहीं है । अर्थात शून्य है । इसके बाद तो उनका भक्त कुछ डर सा गया । मेरे हिसाब से उसकी उम्र कोई ३५-३६ के पास के आस पास होगी और बाबा भी लग्बह्ग इसी के करीब होगा ।पर बाबा था बड़ा जी जमा हुआ खिलाडी । सारी बातों का इस तरह से वैवाहिक जीवन से जोड़ कर उस व्यक्ति के दिलो-दिमाग पर छा जाने को बेताब था और उसके भक्त की बातों से लगा की वो बाबा सफल हो गया था । उन दोनों ने रास्ते भर कुछ एस तरह की बातें की और सवाल किये की मैं लिख नहीं सकता पर समझ जरूर गए होंगे । मेरा ये सोचना है ऐसे ही कम और नासमझ लोंगो का फायदा झोलाछाप डॉक्टर उठाते है और ना जाने क्या से क्या कर देते है व कई बार तो घर की इज्ज़त जाती है और कई इज्जत , लाज , मान मर्यादा और तो और अपने प्रिय की जान तक से हाथ धोना  पड़ता है । कृप्या ऐसा कुछ ना करे ,,,,,,,,,,,,,,

Friday, July 16, 2010

बस में २ तरफ़ा हमला और मैं बेचारा अकेला

कल मुझे एक जरूरी काम से कंही जाना था पर ऑफिस में थोड़े काम की वजह से में वो काम नहीं कर पाया । खैर उसका कोई मलाल नहीं । मैं भी रोज की तरह मस्ती में ऑफिस से घर की तरफ गुनगुनाते हुए निकला । इस बात से अनजान की आज बस में आज मेरे पर हमला होने वाला है । रास्ते में अचानक मेरी संवेदी तंत्रिकाओं ने कुछ जानी पहचानी खुशबू को महसूस किया । वो खुशबू गरमागरम समोसे की थी । ये मेरी कुछ कमजोरीयों में से एक है अगर मेरे पास जेब में रूपये पर्याप्त मात्र में हैं यअ थोड़े कम भी हैं तो में समोसे खा कर बाकि चीजों से समझोता कर सकता हूँ पर गरम समोसों से नहीं । मैंने तुरंत खुशबू की दिशा में कदम बढ़ा दिए । और समोसो को खा कर हो दम लिया । वो पुदीने वाले समोसे और पुदीने वाली चटनी के साथ लगता था अगर दिल्ली में कंही स्वर्ग है तो यंही है यंही है और यंही है । वैसे भी मैंने दिल्ली में इतने अच्छे और सस्ते (दिल्ली के हिसाब से ) समोसे शायद पहली बार खा रहा था । समोसे खाने की मेरी अपनी ही अदा है । अगर दुकान में जगह है तो में गरम समोसे वंही खाना पसंद करता हूँ वर्ना चलते चलते खाना में पसंद करता हूँ । एक बार समोसे एक बार चटनी , फिर समोसा फिर चटनी , बस यही क्रम चलता है । और बीच बीच में गरम आलू से जीभ का जलना भी बड़ा अच्छा लगता है पर संतोष नहीं होता की समोसे को ठंडा होने दू तब खाऊ । इन समोसे के चक्कर में कब बस स्टैंड पर पहुंचा पता ही नहीं चला । फिर भी मेरे समोसे मेरे हाथ की शोभा बढ़ा रहे थे । कुछ लोग के मुह में पानी और कुछ के जलन हो रही थी मेरे इस तरह खाने की अदायगी से । पर में भी मानने वाला कहाँ था चाहे समोसा कितना भी गरम क्यों ना हो । फिर जब बस आई तो जल्दी से उपर चढ़ना भी नहीं भुला सीट जो हथियानी थी । यहीं से मेरे रात की पीड़ा शुरू हुई । मैंने सीट तो हथिया ली पर जल्दी जल्दी में ये नहीं देखा की पिच कौन बैठा था । इसका एहसास मुझे बैठे और लगभग सभी अच्छी सीटों के भर जाने के बाद हुआ । मेरे पीछे जो जनाब बैठे थे वो शायद साउथ के कोई जनाब थे । और किसी महिला मित्र से अपनी भाषा में बतिया रहे थे । और ना जाने वो किस भाषा का प्रयाग कर रहे  थे मुझे कभी वो तेलगु लगती कभी उड़िया तो कभी कुछ और । बस बीच बीच में कुछ संस्कृत के शब्द समझ में आ जाते और कभी कुछ इग्लिश के । मैं उन्ही शब्दों को सुन कर संतोष करने की कोशिश कर रहा था । ये सारे स्वर में दाहिने कानो से सुनाई दे रहे थे । और मेरे बाये काम में एक बहुत की प्रेमिका को समर्पित प्रेमी के शब्द उस अन्य राज्य वाले शब्दो के साथ में मस्तिष्क में मंथन कर रहे थे । वो अपनी प्रेमिका से बड़े ही अजीब तरीके से बात कर रहा था । वो कभी उससे प्यार से बात करता कभी गुस्से से उसका कुछ पता नहीं था की कब क्या कह दे । पर मेरे मस्तिष्क में एक अजीब से पीड़ा हो रही थी ना मुझे चैन था ना मुझे नींद । मुझे दोनों पर दया आ रही थी की देखो बेचारे कितने लगन भाव से सरकार को सेवा कर देने में लगे है और एक मैं हू की चुपचाप इनकी बात सुन रहा हूँ । उन दोनों की बात मेरे स्टॉप पर आने  तक खतम नहीं हुई थी । में उनकी बात से कुछ इस क़द्र बेझिल हो गया था की मैंने एक स्टॉप पहले उतरने का निर्णय ले लिया । और अपनी सीट किसी और को देने का प्रयास किया वो मेरे पास वाले मुझसे ज्यादा चालाक निकले शायद वो उसको पहले से जानते थे और मेरी सीट खाली की खाली ही रही । 

Monday, July 12, 2010

जम के बरसो आज ........

जम कर बरसो आज
धो दो सारी पानी वाली आग
लोग हो जाये तुमसे निहाल
और फिर कहे तुम क्यों आये आज

तुम तब भी ना रुकना
तुम अपने वेग तो मत थमने देना
रफ़्तार और बढा देना
बुँदे और बड़ी कर देना

फिर लोग कहेंगे
आज तुम क्यों बरसे , इतना विशाल
तुम फिर भी मत सुनना इनकी
ये तो लोग है ये सिर्फ कहते है

तुम कम बरसो तो ये कहेंगे
ना बरसो तो ये कहेंगे
कम बरसो तो ये कहेंगे
मंद बरसो तो ये कहेंगे

तुम करो वही जो तुम्हे लगे सही
जितना मर्ज़ी हो उतना बरसो
दिखा तो रास्तो को रास्ता
जम के बरसो आज

Wednesday, July 7, 2010

बस में यात्रीयों की कुछ खास आदतें

सुबह उठने अगर आपको ५ मिनट भी लेट होता है तो आपकी पूरी दिनचर्या डांवाडोल हो जाती है ।  फिर एक के बाद एक आप लेट ही होते जाते है । जब तक की आप किसी एक महत्वपूर्ण काम को छोड ना दे । पर उसको छोडना भी एक साहस वाला काम है । की किसी महत्वपूर्ण काम को ना किया जाये । क्या आप मुह साफ़ नहीं करेंगे, नित्य कर्म से नहीं निपटेंगे , क्या आप ठीक तरह से नहीं नहा कर कंकड स्नानं करने पर जोर देंगे । नहीं ना मेरे साथ ऐसा अक्सर होता है । मैं जरा सुबह उठने में आलसी हूँ । ऐसा नहीं है की में उठता नहीं हूँ में रोज सुबह ब्रह्म मुहर्त में उठता हूँ । और फिट समय देख कर सो जाता हूँ । जिसका जी परिणाम होता है की पिछले १ सप्ताह से में अपने समय वाली बस नहीं पकड़ पाया । उसके पीछे वाली बस में आता हूँ पर पीछे वाली बस रास्ता साफ़ होने के बावजूद आगे वाली बस से कभी आगे नहीं होती बल्कि मेरी तरह आराम से चलती है । और बस में एक चीज़ साफ़ साफ़ शब्दों में लिखी है की आप लेट हैं हम नहीं । अरे इतना साफ़ और बड़ा बड़ा तो उनकी टिकेट पर रुपये भी छापते जितना बड़ा उन्होंने ये उपदेश लिख रखा है । में अपनी नियमित बस की सवारिओं को बड़ा मिस करता हूँ । उसका कारण भी है उस बस में मुझे पता है की अब सीट खाली होने वाली है तो पहले से सेटिंग बन जाती है । मगर मेरे इस बस अगर आपको पता भी है की फलां सीट खली होने वली है तो उसके हिलने से पहले कई लोग हिल हिल के वंह पहुच जाते है । कोई गलती से पुच ले की भाई साहब फलां जगह आये तो बताना । तो सामने वाला उस स्टैंड से २-३ स्टैंड पहले से सीट पर बैठने के लिए कह सेट है की आगे वाला स्टॉप आपका है उतर जाइये । और खुद बैठ बैठ जाता है । और वो भीड़ में बड़ी मुश्किल से गेट पर पहुचता है तो पता चलता है की अभी थोडा टाइम है । पर वो भीड़ का हिस्सा बन जाता है और जिससे सीट मिल गयी वो सीट का । मैंने तो एक बार ऐसा भी होते देखा की एक जनाब यही सोचते हुए १ जनाब को २ स्टैंड पहले उठवा दिया पर उनकी बोये बीज का फल एक जनाब खा गए और उनके बैठने से पहले वो बड़ी शान से बैठ गए और उस आदमी से बोले की भाई साहब आप खड़े रहे आपका स्टैंड अभी दूर है । स्टैंड पर उतना वाला व्यक्ति अपनी खिसियाहट उतार नहीं पाया और गेट पर खड़ा हो अपनी यात्रा को पूरी करता रहा । सीट का मोह इतना बड़ा है की कई महिलओं की सीट बड़ी फक्र से बैठे रहते है । और केवल खूबसूरत महिला या लड़की को देख कर उठते है और तो और कभी वो भी नहीं । जब कोई कह देता है है तो बहस करते है और नियम कायदे कानून की बात करते । और अगर कोई महिला सीट पर किसी तरह बैठ जाये तो कोशिश करते है की सीट पर उनका कोई ना कोई हिस्सा छूता रहे । पता नहीं ये किस तरह का कुर्सी का मोह है या स्त्री का मोह है । पर जो भी बड़ा ही हीन है । कुछ पुरुष सिर्फ महिला सीट पर बैठना ही पसंद करते है चाहे बाकी की सीट खाली क्यों ना हो । पता नहीं उस सीट पर बैठ कर किस तरह के सुकून की प्राप्ति होती है ये मेरे लिए बड़ी ही जिज्ञासा का प्रश्न है । और कुछ महिला सीट पर बैठ कर बड़ी बेसब्री के साथ किसी सुंदर महिला के आने का इंतज़ार करते है और बड़ी प्रसनत्ता के साथ उनको सीट देते है और फिर किसी और सीट के जुगाड में लग जाये है या उसी महिला या लड़की के पास खड़े होने का सुख प्राप्त करते है । और अगर कंही कोई बुजुर्ग महिला आ जाये तो उनका चेहरा देखने कायक होता है । 

Friday, June 25, 2010

बड़े दिनों के बाद एक बार फिर ब्लॉगर के साथ

आज एक बार फिर इतने दिनों के बाद आपके सामने कुछ लिखे का मन हुआ है । पिछले लगभग एक महीने से कुछ ज्यादा ही व्यस्त था जिसके कारण में ब्लॉग में एक भी एंट्री नहीं लिख सका । इसके पीछे कुछ कारण थे । कुछ तो अपने काम में व्यस्त होना अर्थात ऑफिस में थोडा अधिक काम था । और जब उससे कुछ फ्री हुआ तो मेरे पिता श्री जिन्हें सभी जानने वाले चाहे वो छोटे हो या बड़े दददू कहते थे उनका अचानक देहांत हो गया जिसने मुझे पूरी तरह से पंगु बना दिया । आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखे बैठा हू । पर ये समझ नहीं आ रहा है क्या लिखू । यात्रा का विवरण लिखू या क्या । जब दददू के बारे में पता चला तो पूरा का पूरा स्तब्ध रह गया । खैर मृत्यु एक ध्रुव सत्य है  जिसे में क्या बाबा राम देव भी नहीं टाल सकते । उसके बाद पुनः दिल्ली आने के बाद फिर काम में ऐसा रमा की लिखें की आशा आस लगाये बैठी थी की कब में आस से उठ कर बैठू और लिखना शुरू करू ।

आपको बाता दू इतने दिनों से ना लिखने के कारण बहुत सी कहानिया मेरे दिमाग के समुन्द्र में गोते लगा रही  है पर उनको मैं चुन नहीं पा रहा हूँ । यही सोच कर अब में ओक्सीजन लगा कर उस गहरे समुन्द्र में उतरने की तयारी कर चुका हूँ और ये सोच कर बैठा हू की आज समुन्द्र से कोई भी मछली ना पकडूँगा बल्कि सिर्फ उन्हें चारा दे कर आ जाऊंगा ताकि कल से वो रोज मेरे लिए किनारे पर आये और मुझे नित नयी बात याद आये ।

इतने दिनों में क्या क्या नहीं बदला किसी देश का प्रधानमंत्री , वर्ल्ड कप के महारथी , भारत का क्रिकेट इतिहास तो फिर मेरी बस क्यों ना बदलती । मैंने भी अपनी बस बदल ली थी । अब मैं नए रूट और नए बस की सवारिओं के साथ आता हूँ । कहते है परिवर्तन जीवन के लिए अच्छा होता है।

मेरे साथ भी कुछ कुछ अच्छा रहा । बस का माहौल अच्छा था । ऑफिस पहुचने में पुरे २५ मिनट की बचत होती थी । जिसके कारण अब में आराम से ३० मिनट ज्यादा सोता था । मेरी भाभी को ३० जायदा सोने की भी आजादी मिल गयी । अलबत्ता मेरे भतीजे जनाब अब वक्त से १ घंटे पहले सो कर उठ जाते है । जिसका नुक्सान मुझ जैसे गरीब को उठाना पड़ता है । पर उसके साथ थोड़ी देर खेल कर उस १ घंटे के नुकसान से बाबा रामदेव की कसरत के समान उर्जा शरीर आती हुई लगती है । सरे अंग भलीभांति चलते हुए लगते है । वैसे बस में रोज ना रोज कुछ ना कुछ ऐसा वैसा अजीबो गरीब द्रश्य परिद्रश्य नज़र वजर आ ही जाते है । जिनका मैं कल से जिक्र करना शुरू कर दूँगा । पर इतना तो जरूर है की पुराने रूट और नए रूट में बहुत अन्तर है । पुँराने रूट में जन्हा नित नए स्ट्रैंड पर कुछ ना कुछ होता रहता था यंह पर स्टैंड नियत है जिन पर घटनाये भी नियत है । पर जो जो होता है वो भी कम रोमांच पैदा नहीं करता । 

Saturday, May 1, 2010

रिक्शे पे सवारी और उसकी रफ़्तार

आज कल ऑफिस में अत्यधिक काम कि वजह से आने और जाने का सारा समय बदल गया है । जिसके कारण लिखने का समय भी नहीं निकल पात हूँ चूँकि घर पर कंप्यूटर है पर इन्टरनेट न होने के कारण घर पर लिखने का काम नहीं कर पाता हूँ । इसलिए अपने ब्लॉगर के कारण ऑफिस के कंप्यूटर पर ही निर्भर हूँ । उसका एक कारण और है । वो मेरा समय मेरे घर से ज्यादा ऑफिस में ही बीतता है । दिन का कुल १०घंटे से ज्यादा समय ऑफिस में देना पड़ता है जो कि खुद एक बहुत बड़ा काम है । आज लेबर दिवस के रूप में पूरे भारत में मनाया जाता है । बड़े बड़े संस्थान बंद है आज हमरा ऑफिस आज भी खुला है । चलो इसी बहाने मेरा ब्लॉग भी छप जायेगा वरना आज भी नहीं लिख पाता । अगर आपने गौर किया हो तो रिक्शे वालों कि क बात मुझे बड़ी अच्छी लगाती है । जब कोपुरुष रिक्शे पर बैठता है तो रिक्शे वाले के चलने का तरीका बदल जाता है और जब कोई महिला किसी रिक्शे पर बैठती है तो रिक्शे वाले का चलने का तरीका बदल जाता है । जैसी जब कोई लड़का बैठा रिक्शे पर और वो बोल दे कि भैया जरा तेज चलाना तो रिक्शे वाला तुनक कर कहेगा कि भाईसाहब जितना दम होगा उतना ही चलूँगा न अब कोई अपनी जान तो नहीं दे दूँगा । बात भी सही उसकी । चाहे लड़का कितना भी हल्का हो रिक्शा अपने औसत रफ़्तार से थोडा कम ही चलेगा । और दूसरी तरफ कोई महिला रिक्शे पर बैठ जाये तो महिला सवारी के संवाद बदल जाते है उन्हें कहना पड़ता है कि भाईसाहब जरा धीरे चलाओ मुझे इतनी जल्दी नहीं है । ओए ऐसा नहीं है रिक्शेवाले के शारीर पर उसकी रफ़्तार निर्भर करती है  हालाँकि किसी किसी कि करती है पर वो अपवाद है । मैंने कई बुजुर्ग रिक्शे वालों को महिला सवारी बैठा पर भगाते हुए भी देखा मुझे समझ में नहीं आया कि ये रफ़्तार कब से सवारी के लिंग पर निर्भर होने लगी है । काश ये ख्याल मोटरसाइकिल बनाने वाले आविष्कारक को आया होता हो आज मोटर कि जरुरत नहीं पड़ती ।  रिक्शा ही मोटर का रूप ले लेता । आप अगर पुरुष है और रिक्शे पर बैठे हैं तो समझ लीजिए ही आप समय से पहले घर से निकल जाइये वर्ना समय पर रिक्शा तो नहीं पहुचायेगा । मेरा मनना तो ये है कि जहाँ  मोटर को बनाने में इतने लाखो करोडो रुपये खर्च हो रहे है वंही उनको इस  बात को भी गौर करना चाहिए कि ऐसा कौन का गुरुत्व का बल लगता है सवारी रिक्शे वाले में एक्स्ट्रा होर्से पॉवर दे देती है जो उसकी रफ़्तार अपने आप चरम पर पहुच जाती है । मेरी रिक्शे वालों से कोई जातीय दुश्मनी नहीं है पर ये एक ऐसा शोध का विषय था जिसे में बचपन से शोध करना चाहता था कि इसके पीछे कारन क्या है । मैंने इसके लिए कुछ लोगो से बात भी करना चाहा पर उब्को ये टापिक उतना अच्छा नहीं लगा और वो एस सिरे से मुकर गए । मैंने भी वक्त के साथ इसको भूल गया । बस देख देख कर कुछ गौर करने कि कोशिश  अब तक करता हूँ । ये गुण मेरे ख्याल से प्रतेक शहर के रिक्शे वाले में पाया जाता है । चाहे वो कानपूर हो या लखनऊ या फिर बिहार या जयपुर । मेरे ख्याल से ये रिक्शे वालों का कोई विशेष गुण है । जो सिर्फ रिक्शेवालों में पाया जाता है । तो अगली बार जब भी आप रिक्शे पर बैठे तो ऐसा आजमा कर जरूर देखे । और हो सके तो मुझे जरूर बताये । 

Wednesday, April 28, 2010

बस में ठूसी हुई सवारी और कान में हेडफोन

आजकल ऑफिस में बड़े ही अजीब तरह का माहौल है । पता ही चलता कि टाइम पंख लगा कर उड़ जाता है । पता ही नहीं  चलता  कि आने के बाद समय कैसे पास हो गया । और जब ऑफिस से जाने का समय होता है तब पता चलता है अरे अब तो जाने का टाइम हो गया अभी तक तो ब्लॉग का ब भी नहीं लिखा । फिर लग जाता हूँ  जुगाड में मे कि कैसे टाइम निकल कर ब्लॉग को मूर्त रूप दू  । वैसे भी कल ऑफिस अपने समय से थोडा पहले निकला मन में वो चमकता सूरज रात में भी चमक रहा था । और निगाहे रात में भी सूरज को ढूंढ रही थी । पर आज तक  नोर्वे को छोड़ कर रात में कंही कभी सूरज नहीं निकलता ये बात में भूल गया था । में अपनी रफ़्तार में चल रह रहा था । कि स्टैंड तक आराम से जाऊंगा पर मेरे कदमो के साथ यातायात भी रुका हुआ था और इतना कि पैदल चलने लायक भी जगह नहीं बची थी  । पर पैदल चलने वालों को आजतक कोई रोक पाया है जो आज रोक पायेगा । मैं भी दाये बाये करते हुए कार पर चढ़ते हुए अपने रास्ता बना ही लिया और न जाने कितनो ने मेरा अनुसरण किया और मैंने किसी और का किया था । उस समय कार वाले भी कुछ नहीं बोले उन्होंने ऐसा क्यों किया ये मुझे नहीं पता । आज बस स्टैंड कि लाइट खराब थी तो अँधेरा अँधेरा हुआ था । किसी का चेहरा पहचान नहीं पा रहा था और मेरी निगाहें उस खैनी वाले भैया को ढूढ़ रही थी क्योंकि लगभग एक हफ्ते से उनको नहीं देखा था । तो मन में देखने कि एक अजीब सी ईच्छा हो रही थी । आज बस ने कम से कम २० मिनट तक रुला दिया । मेरी वाली छोड बाकी सब आने का नाम ले रही थी और आ कर कर जा रही थी । और उस अँधेरे में हम जैसे मुसाफिर का ध्यान नहीं दे रही थी । उसके बाद बस का आगमन हुआ तो एक साथ झुण्ड के झुण्ड चढ़ने लगे तो बस कि खिडकी से एक सज्जन ने आवाज़ दि कि अरे पीछे २ बस और भी आ रही है । पर उनकी ये आवाज़ सड़क कि आवाज़ में दब कर रह गयी और एक यात्री बस के गेट में । किसी तरह उनको उससे निकला गया तो बस में जान आई और बस ने आगे का गीयर दबाया गया । आगे तो मत पूछो आज बस में अपने आप ठूस ठूस के सवारी अपने आप चड गयी थी । और बस वाले ने बस को सिर्फ उतरने वालों के लिए ही खोलने का निर्णय लिया । ये भी एक तरह का हाहाकार था । उनके लिए जो बस के बहार थे और बड़ी देर से बस का इंतज़ार कर रह थे । तो बस जहाँ रूकती वो आगे या पीछे कंही से भी चड़ने के लिए बेताब हो जाते और मैंने देखा कि एक दो को इसी कारण चोट भी लगी और वो गाड़ी वाले पर गुस्सा भी हो गए । पर इन सब से एक व्यक्ति अनजान था । उसको किसी भी दुनिया कि खबर नहीं थी क्योंकि वो अपने कान में हेडफोन लगा कर मस्ती में आँखें बंद कर के गाना सुनने में लगा हुआ था । उसको ये भी होश नहीं था कि आसपास क्या हो रहा है । और तो और वो गाना सुनने के साथ साथ गाना गाये भी जा रह आता । कभी गाना इंग्लिश का होता तो कभी हिंदी । और सुर माशा अल्लाह वो भी बड़े चुन चुन के निकल रहे थे । और जब किसी के कानो में हेडफोन लगा होता है तो उसके सुर अपने आप तेज हो जाते है जैसे उन जनाब के थे । उनको इसका भी पता नहीं चला कि कब धूल वाली आंधी ने बस पर हमला किया और निकल गयी । मैंने भी स्टैंड आने पर उतरने का फैसला कर ही लिया ।

Tuesday, April 27, 2010

बस का नहीं ऑटो वाले भैया को धन्यवाद

एक बार पुनः आप सभी से क्षमा चाहूँगा कि मैं पुरे ३ दिनों के बाद ब्लॉग पर आया हूँ । इसके पीछे मेरी ही कुछ कहानी है जिसे में बयां नहीं कर सकता हूँ । पर सच मानिये लिखते वक्त बड़ा सुकून मिलता है । आज में सबसे पहले उस ऑटो वाले भैया को धन्यवाद देना चाहूँगा जिसने मेरी जान बचायी । अगर वो सही समय पर ब्रेक पर पैर नहीं रखता तो आज में कंप्यूटर पर ऊँगली नहीं रखता । तो धन्यवाद अनजान ऑटो वाले भैया । हुआ ये था कि सोमवार का दिन था धूप अपने चरम पर थी पता नहीं मुझे  क्या हुआ मैं १० मिनट के लिए ऑफिस के बाहर चला आया और धूप का आनंद लेने लगा मतलब अपने काम से ऑफिस के पास वाले मार्केट में जाने लगा ।  काम करके जब में  मार्केट से वापस आने लगा तो एक गोल चक्कर पड़ता है रास्ता उतना चला नहीं है जितना चलना चाहिए मैंने देखा रोड के दूसरी तरफ एक बड़ी ही सुंदर सी विदेशी महिला ऑटो का इंतज़ार कर रही है । सच मानिये मेरी रफ़्तार को वंही पर ब्रेक लग गया । और एक बात और अपनों मनना पड़ेगा जैसे धूप में शीशा चमता है उसी तरह वो विदेशी महिला चमक रही थी । उसका भी कारण था । उसके कम से कम वस्त्र । उसने सुपर मिनी स्कर्ट पहन राखी थी जिससे उसका आधे से भी जायदा शारीर दिखाई दे रह आता और धूप में चमक रहा था साथ में छोटी सी टीशर्ट जिससे धूप भी टकरा कर शर्मा रही होगी । खुदा कसम वो सच में बाला थी । उम्र कोई २०-२१ कि होगी । मैं बस उसको ही देख रहा था और मेरी सुधबुध खो सी गयी थी । और शायद मुझे ये भी याद नहीं टइ मैं रोड के बीच में चल रहा हूँ कि तभी चीईईईई कि आवाज़ से किसी ने ब्रेक लगायी तो होश आया कि में एक ठीकठाक रफ़्तार वाली ऑटो के ठीक सामने खड़ा हूँ और शायद मेरी उस स्थिति का अंदाजा उस ऑटो वाले भैया ने भी लगा लिया और वो मुस्कुरा कर बोले कि देखो देखने में कोई बुराई नहीं है पर चश्मा लगा कर । मुझे बड़ी झेप का एहसास हुआ । पर एहसास फिर भी ना जागा । अभी भी दिल था कि मानता नहीं वाला हो रहा था । ध्यान रह रह कर उसी तरफ जा रह आता । ऑटो से बचने के बाद दिल धडकन ने गति पकड़ ली थी । पर उसको अब तक ऑटो नहीं मिली थी । उस दिन मुझे थोडा सा पझ्तावा हुआ कि मैं ऑटो वला क्यों नहीं बन गया । पर कोई नहीं दूर के ढोल हमेशा सुहावने नहीं होते । वो मुझे एस खेल कि शातिर खिलाडी लग रही थी क्योंकि सब ऑटो वाले उससे जायदा कि उम्मीद कर रहे थे पर वो अपने कपड़ो के हिसाब से कम कि । पर ऑटो वाले ठीक उसका औलता सोच रहे थे । उनको चाहिए था ज्यादा । मैंने कुछ देर रुकने का मन बनाया और सोचा कि अब ऑटो करा ही दू तो जायदा अच्छा है ।कंही कुछ उल्टा सीधा न हो जाये । इसी क्रम में में एक पेड का सहारा ले कर खड़ा हो गया और सोचने लगा कि कंही ये मोहतरमा अगर बस में चले तो रोज बस में दंगा भड़क जायेगा और रोज अग्निशमन दल को बस में आग बुझाने के  लिए बुलाया जायेगा । पर इसका बस के बाकी लोग  कतई बुरा नहीं मानेगे इतना तो मुझे पक्का विश्वास है । और मैं भी सहमंत हूँ ।  वैसे कई लोगो को मेरा ये व्यव्हार बुरा लग सकता है पर इसमे मेरा कोई दोष नहीं है । अगर आपके चेहरे पर कोई चमकती चीज़ टकराएगी तो आपकी निगाह तो जायेगी ही । और एक बात और कहना चाहता हूँ कि इस व्यक्ति विशेष लक्षण से पता चलता है कि मैं अपने ही पर्यायवाची का नहीं बल्कि अपने बिलोम का प्रेमी हूँ । 

Friday, April 23, 2010

बस में ब्लॉगर और अजीब सी उदासी

कल २ दिनों के बाद जो लिखा उससे मेरे कुछ दोस्त बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे थैंक्स लिखने ले लिए , आज पुरे दो दिनों के बाद कलम उठाई , और बहुत अच्छे जैसे कमेन्ट से मेरा उत्साह बढ़ाया । जिसने सच मैंने मुझे एक नए उत्साह का एहसास कराया है । कल ऑफिस में फिर थोडा बिजी था पर कल और आज दोनों दिन ब्लॉग लिखने का समय निकल लिया । कल ब्लॉग लिख कर बड़ी ही मस्ती के साथ ऑफिस से निकला । अंदर एक अजीब सा उत्साह था । शायद ब्लॉग लिखें कि खुशी थी या शायद कुछ और जो मैंने नहीं जनता । कल वही अपना घर जाने का समय पुराना था । रात के अँधेरे में एक बस का ब्लॉगर निकलता है जिसे लोग विपुल कहते है । वैसे मजाक मजाक मैं ये लाइन बड़ी अच्छी निकली या खराब ये तो आप ही लोग बताएँगे । खैर २ दिनों के बाद वापस स्टैंड पर एक निश्चित समय पर आना बड़ा अच्छा लगा और १-२ चेहरे पुराने लगे थोड़े नए भी आ गए थे ।पर बस स्टैंड का माहौल नहीं बदल था एक नयी चीज़ हुई थी कि चूँकि गर्मी अपने चरम पर पहुच चुकी है तो एक के बजाये दो पानी वाले जरूर खड़े हो गए । जो मेरे सामने रहते तक बिजी रहते है । उनको साँस लेने तक कि फुर्सत नहीं रहती है । मेरे ये समझ में नहीं आता ही लोग कितने प्यासे है । चलो इसी बहाने कम से कम उनका तो काम चल जाता है और रोज़ी रोटी भी । लगभग १५ मिनट खड़े होने के बाद बस का आगमन हुआ ।  मेरी नज़र उस खैनी वाले को ढूंढ  रही थी ।   वो मुझे आज नहीं दिखाई दिया । मैं बस के अंदर था और एक कोने में खड़ा हो गया था । आज अंदर से मन कुछ उखड़ा उखड़ा स लग रह आता । पता नहीं क्या चीज़ थी जो मुझे कम लग रही थी । और कुछ न होने का एहसास दिला रही थी । शायद उसका नाम मुझे नहीं पता था । में रह रह कर तडप रहा था और उसका नाम मेरे जेहन में नहीं आ रहा था । लगभग १० मिनट बाद मुझे सीट नसीब हुई पर ये खुशी भी मुझे ज्यादा देर नसीब नहीं रही और एक बुजुर्ग के आने के बाद वो उनके नसीब में स्तान्तरित हो गयी । मुझे कभी कभी बड़ा कोफ़्त होता है कि जब कोई अच्छी डील डोल वाली युवती बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में इंग्लिश के २ शब्दों में अपने उठने कि प्रार्थना करती है तो जब नारी के आगे विश्वामित्र कि नहीं चली तब तो में साधारण मानव हूँ जिसके अंदर मेरा स्वयं का दिल धक् धक् करता है । पर में किसी महिला के बजाये किसी बुजुर्ग या उम्र दराज महिला को सीट देना ज्यादा सही सोचता हूँ । और मैं खुद महिला सीट पर  बैठने से परहेज़ करता हूँ और खड़े हो कर यात्रा करना ज्यादा पसंद करता हूँ । बाकी का सफर मेरा खड़े खड़े गुजरा जिसका मुझे कतई भी गुरेज नहीं है । क्योंकि मेरे से ज्यादा बुजुर्ग को सीट कि जरूरत थी । वैसे मेरे जैसे बस में मैंने कई लोंगों को देखा है जो स्वेक्षा से अपनी सीट बुजुर्ग महिला और पुरूष के लिए छोड देते है  । तब मुझे और खुशी होती है । और कुछ लोग मुझे बस में बड़े अछे लगते है क्योंकि वो बस को संगीतमयी बना देते है । उनके नेपाली फोन में लगा बड़ा सा स्पीकर वो ऑफिस से निकलते ही आन कर देते है और पूरे रास्ते वो सबका मनोरंजन करते हुए जाते है । उनको इससे कोई मतलब नहीं कि किसी के साथ कितना चचा हुआ होगा पुरे दिन या कितना बुरा हुआ होगा वो अपनी मस्ती में चूर रहते है । इसमे मैंने कई बुजुर्गो  को भी देखा है जो बस में अपने समय के हिट गानों को सुनते है और अपनी  ही मस्ती में खोये रहते है । आज खड़े खड़े यात्रा करने में भी एक नया ही आनंद और सुख था । 

Thursday, April 22, 2010

रात में बस का सफर और फोर्मुला वन का अनुभव



आज पूरे दिनों के बाद आपके सम्मुख हुआ हूँ । पिछले दो दिनों से कुछ भी न लिखा पाने का क्षमाप्राथी हूँ । पिछले २ दिन ऑफिस के काम में कुछ ज्यादा ही उलझा हुआ था जिसके कारण मैं अपने निजी ब्लॉग को अपडेट नहीं कर पाया । जिसका मुझे स्वयं बहुत दुःख है । ऐसा नहीं था की मैं ऑफिस के काम मैं इतना खो गया था की मैं थोडा समय भी नहीं निकाल सकता था । पर वो कहते है हरी खोजन को हरी चले हरी पहुचे  हरी पास । कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ जब लिखने का मन करता तो कंप्यूटर खली नहीं मिलता और जब कंप्यूटर खाली मिलता तो लिखने का मन नहीं होता । आज दोनों का मिलन हुआ है तो पुरे दो दिनों के बाद आपके सम्मुख फिर से आया हूँ । मंगल मेरे लिए कुछ खास नहीं हुआ वही ऑफिस की भागदौड और वही काम । जब जाने का समय हुआ तो एक और प्रोजेक्ट चलो उसको भी खत्म किया और जाने की तैयारी शुरू की । जब समय देखा तो थोडा ज्यादा ही बता रहा था । फिर भी मैंने बहुत दिनों के बाद रात में ही बस का सफर करने की सोची । ऑफिस से स्टैंड पर जब पंहुचा तो आज का द्रश्य कुछ और था । और दिन यंह पर भीढ़ हुआ करती थी पर उस दिन सन्नाटा पसरा हुआ था । स्टैंड पर कोई नहीं था । मुझे लगा कंही मैंने आज कोई फैसला गलत तो नहीं ले लिया । लगभग १०-१५ खड़े होने के बाद मैंने देखा की ऑटो वालों की तो लाइन लगी हुई है और वो सब के सब मुझे अपने संभावित सवारी समझ कर मेरे आगे धीरे हो जाते थे । पर मैं तो बस का मुरीद । जैसे गोपियाँ कृष्ण की । कोई भी ऑटो वाला मेरा मन नहीं बदल पाया । मेरे ख्याल से उनकी बहुत से बद-दुआ मुझे लगी होगी । पर मेरा मन तो मेरी बस ले कर अपने साथ चल चुकी थी और अब तक मेरे सामने नहीं आई थी । उफ़ काश मैंने आज फिर कार मांग ली होती । मैंने सोचा था की बस मेरे सामने कड़ी हो गयी । और लग रह आता की जैसे मुस्कुरा रही है की आओ बैठो । मैंने उसकी इस अदा को भापा और बड़े प्यार से चढ गया । बस में ज्यादा सवारी नहीं थी । मेरे ख्याल से सब बस प्रेमी ही थे मैं टिकेट ले कर अपनी सीट पर बैठ गया । देखा कुछ लोग बस में लगभग सो चुके है । कुछ तो इतने गंभीर मुद्रा में सो रह थे की उनको इस बात का पता भी नहीं चलता था की बस कब रुकी और कब चल पड़ी । और लोंगो को मैंने बागी ही अजीब मुद्रा में सोते हुए देखा । किसी की टांग कंही और हाथ कंही और थे पर वो सोते हुए बड़े अच्छे लग रहे थे । मुझे  उस दिन कैमरा वाले फोन की कमी सच मैं खली । पर कोई नहीं मेरा कोई हक नहीं बनता की मैंने बस में सोते हुए लोंगों की पिक्चर को अपने ब्लॉग में लगाऊं । टिकेट काटने  वाले अंकल भी आधे सो आधे जाग रह थे । पर बस का ड्राईवर पूरी तरह सचेत था । जिसकी मुझे सबसे ज्यादा खुशी थी की ड्राईवर को अपने फर्ज की कितनी चिंता है  । वो अपनी पूरी शिद्दत के साथ बस को खाली सड़क पर फोर्मुला वन कि तरह चला रहा था । ड्राईवर से मुझे  फोर्मुला वन कि किसी कार मैं बैठे हुए सवारी या साथी का एहसास दिला रह आता फोर्मुला वन क्योंकि बस में हम दोनों ही पूरी तरह जाग रह थे । बाकि सब तो निद्रा में खोये हुए सपनो कि दुनिया मैं खोये हुए थे । आज रात्रि के सफर में मज़ा बहुत  आया । समय का तो पता नहीं चला और न जाने कितनी जल्दी मेरा स्टॉप आ गया ।  स्टैंड पर बिताया हुआ १५ मिनट बस वाले कि रफ़्तार ने कवर कर दिए थे । काश रोज ड्राईवर इसे ही और इतने रफ़्तार में मुझे ऑफिस से घर पंहुचा दे तो क्या कहने । यही सोचता हुआ मैं अपने स्टॉप पे उतर गया ।

Tuesday, April 20, 2010

खाली बस का आनंद और राजसी सुख का एहसास

कल का दिन वैसे सभी लिहाज़ से शनिवार और रविवार से अच्छा था । कम से कम सोमवार को वो सब नहीं हुआ जो रविवार और शानिवार को हुआ था ।पूरा दिन अच्छे से गुजर गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो । कब १० बजे कब १२ और कब ५ पता ही नहीं चला । हालाँकि काम कुछ खास नहीं किया पर जो किया वो लगन के साथ किया । तो वही वाली बात याद आ गयी की समय बितते देर नहीं लगती । कुछ ऐसा ही सोमवार को हुआ था । मैं भी सोमवार के खतम होने का इन्तजार करने की इच्छा नहीं हुई वो तो अपने आप ही तेजी से खतम हो गया । और मेरे जाने का समय नजदीक आ गया व् कल मेरे एक और मजेदार बात हुई कल मेरे ऑफिस में सबको पता चल गया की मैं एक ब्लॉग का मालिक हूँ । क्योंकि जब में कल का ब्लॉग लिखने में मग्न था तब भी न जाने कब मेरे बॉस मेरे पीछे आ कर विराजमान हो गए पता नहीं चला । और जब तक पता चलता तब तक देर हो चुकी थी । खैर उन्होंने एक ही बात कही की तुम भी ये फालतू चीजों में यकीन करते हो । मैंने कहा सर बड़े बड़े आदमी ऐसा करते है तब तो मैं एक अदना सा इंसान हूँ । उनका दूसरा सवाल था कोई पढता है या नहीं ।या इसे ही ऑफिस में कोई काम नहीं तो लगे लिखने ।मैंने उन्हें आश्वासन दिया की सर कुछ मेरे जैसे ही पढ़ने वाले है जो नित्य मेरा ब्लॉग बड़े चाव से पढते है । ये अलग बात है की कमेन्ट करने में कतराते है । और मुझे उनको खोद खोद कर कमेन्ट लेना पड़ता है । वो भी हसते हुए चले गए और बोले लिखो और लिखो जब कोई न पढे तो हमें बता देना । पर मेरा लिखा उससे प्रभावित नहीं हुआ । मैं उतने ही लगन से लिखें में लगा हुआ था । पता नहीं क्यों आब ये मेरे शाम के समय का एक हिस्सा बन गया है । जिसे में रविवार को मिस करता हूँ । फिर ब्लॉग लिखने के बाद पोस्ट किया और घर जाने की तैयारी भी कर ली । ऑफिस से स्टैंड तक बड़े मज़े में पहुचा । स्टैंड पहुच कर देखा की अभी अभी एक बस निकली है वो भी खाली तो मुझे बड़ा खराब टाइप का लगा । की उफ़ खाली बस थी सीट का भी कोई झंझट नहीं होता और मज़े में घर पहुच जाता । पर होनी को कुछ और लिखा था । लगभग १० मिनट पर मेरी आँखों का विश्वास नहीं हुआ । मैंने आँखों को मलने का प्रयास किया पर वो भी सफल नहीं हुआ क्योंकि जो देखा वो सच था । सामने से पूरी की पूरी बस खली मेरे पास चली आ रही थी । और मेरे सारे शरीर में खून की रफ़्तार को तेज कर रही थी । पर वही हुआ जो होना था बस मेरे स्टॉप पर रुकी और उसने मेरे लिए अपने गेट खोल दिए । मुझे बिलकुल रेड कारपेट वाला अनुभव हो रहा था । जैसे में बस का उद्घाटन कर रहा हू । टिकेट ले कर मैं बहुत दिनों के बाद इस बात का चुनाव नहीं कर पा रहा था की किस सीट पर आज बैठू । क्योंकि मेरे साथ कोई ४-५ लोग और चढ़े होंगे ।उनकी भी हालत मेरी जैसी ही थी । वो भी थोड़े भ्रमित टाइप के हो गए होंगे । क्योंकि इस टाइम पर ऐसा चमत्कार बिरले ही होते है । वो कहवत है न की “बिल्ली के भाग्य से छींका फूटा” । आज हमरी किस्मत थी ।उसके बाद तो पूरी बस राजसी सवारी बन कर चली जा रही थी । मैं सबसे आगे की सीट पर बैठ गया । ये सीट कल बिलकुल बग्गी का एहसास दिला रही थी । और पता नहीं क्यों मुझे बड़ा गर्व लग रहा था उस सीट पर बैठ कर । मैं जितना सुख ले सकता था वो मैंने लिया उसके बाद स्टैंड आने पर अपनी सीट को बड़ी मुश्किल से खाली किया ।

Monday, April 19, 2010

बस हुई खराब और रविवार हुआ बर्बाद

पता नहीं कभी कभी मुझे क्या होता है की मेरा मन अचानक किसी काम में नहीं लगता है ।  और कभी कभी ऐसा होता है मन या तन मन धन सब के सब उसी में लगता है । इसका कारण मैं आजतक नहीं जान पाया । और आगे का भी कोई इरादा नहीं लगता । इसका भी कारण पता नहीं है । शनिवार को काम कुछ नहीं था । बस चंद लाइन का काम करके परे दिन फरारी कटी ऑफिस में । कभी इधर जाता  कभी उधर जाता । क्योंकि कोई काम नहीं था और अगर बॉस के सामने आता तो वो कोई न कोई काम थमा देते जो मुझे करना पड़ता । इससे अच्छा था की झूठे काम का बहाने बनाते रहो और टाइम पास करो । जैसे तैसे दिन पल पल कट रहा था । हर पल पल पल पर भारी था ।  कभी तो पल मुझे पर भारी पड़ता तो में सोफे पर भरी हो जाता । और झूठे चिंतन की मुद्रा बना कर पल पल को धोखा देने की कोशिश करता । कभी खुद को लगता की सफल हो गया तो कभी लगता नहीं यार थोडा और काम करना है अभी । चलो जैसे तैसे करके शाम में ५ बजे घर जाने का प्लान बना । अब तो बैचेनी और बढ़ गयी थी । ऑफिस से निकला तो लगा क्यों निकल आया । ऑफिस में ही अच्छा था । मुझे जादू का वो संवाद याद आ गया धूप । रोड आज उतनी ही खाली थी जितनी अन्य दिनों भरी रहती है । मैं भी जादू को याद करता हुआ बस स्टैंड की तरफ रवाना हो गया । सोचा की शायद बस जल्दी मिल जाये तो काम बन जाये और में ऑफिस से घर  जल्दी पहुच जाऊ पर हाय रे मेरी किस्मत । ऐसा उस दिन भी नहीं हुआ । में बस स्टैंड पर खड़ा खड़ा धूप धूप करता रहा और बस उतनी ही देर से आई और जब आई तो सारी उम्मीदों पर पानी फेरती हुई आई । क्योंकि बस ठसाठस भरी हुई थी । और बड़ी मुशील से एक सुरक्षित जगह पर खड़े होने लायक सीट मिल पाई । अब तो थोडा थोडा गुस्सा भी आ रहा था की ऐसा मेरे ही साथ होता है या कोई और भी इसका भागीदार है जिसे मुझे ही ढूंढ कर अपना गम बांटना पड़ेगा । बस आज अपने रफ्तार पर थी और मुझे लगा की अगर ऐसी ही बस चलती रही हो शायद ये आधे घंटे में मुझे अपने स्टॉप तक पंहुचा दे । पर वो कहावत है न की जब आपकी किस्मत खराब हो तो ऊंट पर भी बैठ जाओ कुत्ता जरूर काट खायेगा । वही कुछ हुआ मेरे साथ । १५ मिनट बाद ही बस खराब हो गयी । और बस ने न चलने की कसम खा ली । अब तो गुस्से के से मेरे साथ साथ कई लोंगो का परा तापमान का साथ दे रहा था । और शायद तभी उस दिन रिकॉर्ड गर्मी थी ।पूरे १ घंटे के करीब धूप धूप करने के बाद बस ने अपनी पुरानी चाल पकड़ी पर इस  बार बस नयी थी मतलब दूसरी थी । और मज़े की बात ये थी की इस बार में सीट पर बैठा था और जो पिछली बस में बैठा था वो खड़ा था । मुझे अंदर से थोडा थोडा अच्छा लगने लगा था । इसमे मेरी कोई गलती नहीं है की मैं बैठा ये उस महोदय का ही निवेदन था की मैं बैठ जाऊ । क्योंकि उनका कहना था की वो दिन भर बैठे ही रहते है । तो उनको बस में बैठना उतना पसंद नहीं है । तो उन्होंने अपनी सीट स्वेच्छा से मुझे दे दी । मैं भी बड़ी इच्छा से उस पर विराजमान  हो गया । और तब तक रहा जब तक मेरा स्टैंड नहीं आ गया । पर उस दिन का बुरा साया रविवार तक मेरे साथ रहा । जिसने मेरा रविवार बर्बादवार बना दिया ।

Saturday, April 17, 2010

बस में चोरी और सब के सब शांत

कल ऑफिस से जाते वक्त एक बड़ी अच्छी घटना घटी । उससे पहले बता दू की ऑफिस का दिन बड़ा अच्छा था । कुछ खास हुआ नहीं ऑफिस में । घर जाने का वही पुराना समय चुना और बस की भीढ़ में शामिल हो गया । आज स्टैंड कुछ कुछ मज़ेदार नहीं था । भीढ़ उतनी नहीं थी । और न ही वो खैनी वाले भैया दिखाई दिए । हो सकता है वो आज पहले चले गए हो । मैं बस का इंतज़ार करने लगा । थोड़ी देर में बस भी आ गयी । बस पहले से भरी थी स्टैंड पर आकर वो और भी भर गयी । चड़ने में थोड़ी में थोड़ी म्हणत लगी पर आखिरकार स्टैंड का एक एक आदमी बस में चढ गया । चलो टिकेट ले कर एक सुविधाजनक स्थान देखने की तैयारी करने लगा । वो मिल भी गई । कुछ देर तो बस में कुछ नहीं हुआ । तो में सोचने लगा की क्या कल का ब्लॉग खली रहेगा । मैंने सोचा की अभी तो बस में चढा हू अभी तो पुरे १ से ज्यादा घंटे का सफर है कुछ न कुछ तो होगा ही । मैं यही सोच कर अंदर बाहर देखने लगा । पता नहीं ऐसा मुझे ही लगता है या कुछ और भी है की जब में बस में होता हू तो बाहर अच्छे अच्छे लोंगो को देखता हूँ । जब बाहर होता हू तो बस में अच्छे लोंगों  को देखता हूँ । कार में होता हू तो ऑटो में अच्छे लोंगो को देखता हूँ ऑटो में होता हूँ तो कार में तो हमेशा ही अच्छे लोंगो को देखता हूँ । मैं इससे अनजान हू की मेरे साथ ही ऐसा होता है या कोई और भी इसका भुक्त भोगी है । बस इसी उधेड़बुन में बस का सफर चल रहा था । पता ही नहीं चला कब समय का पहिया घूमता गया और मैं अपने घर के पास पहुच  गया । पर होनी को मेरे ब्लॉग पर कुछ तो लिखवाना था उसके लिए में ब्लोगमाता का धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्गोने अचानक आ कर कुछ ऐसा करवा दिया की पूछो मत । हुआ ये की सन्नाटे को चीरती हुई एक चीख निकली । चीक सुन के लगा किसी का क़त्ल हो गया । पर सनसनी फुनफनी हो गयी । किसी ने किसी की जेब में हाथ मारने की कोशिश की थी और एक महिला ने उसका सजीव प्रदर्शन देख कर चीख निकाल दि थी । उस घटना में चीख ही सबसे अच्छी थी । बाकि सब बेकार क्योंकि जिसकी जेब पर हाथ मारा गया वो कुछ नहीं कर पाया । वो महिला बार बार इशारा कर रही थी की ये चोर है इसने हाथ मारा था पर निरह भीढ़ वही कौन कौन करती रही । बस के दोनों गेट बाद थे । पर फिर भी कोई सीधे हाथ नहीं मार रहा था सब सिर्फ कौन कौन कर रहा था । कोई भी उस चोर को सीधे हाथ नहीं पकड़ रहा था । हालाँकि वो चोर अपना काम पूरा नहीं कर पाया था इस लिए जिसके साथ ऐसा हुआ उसका सब कुछ सुरक्षित था । तो उसको कोई चिंता नहीं थी वो भरी हुई बस में धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था । जबकि सबसे ज्यादा उसको चिंता और सजग रहना था । उसको इन सबसे कोई मतलब नहीं था वो तो बस अपनी दुनिया में मग्न था । लग्बह्र ये सिलसिला ५-६ मिनट चला होगा । पर हुआ वही ढाक   के  तीन पात । उसके बाद जो स्टैंड आया उसमे वो चोर बड़ी ही शांति के साथ नीचे  उतर गया । सब देखते रह गए । मुझे कल के दिन और उस दिन में कुछ ज्यादा अंतर नहीं लगा क्योंकि उस दिन भी एक ही आदमी ने आवाज़ उठाई आज भी एक ने ही आवाज़ उठाई । उस दिन जिसके साथ हुआ वो ज्यादा चौकस था आज जिसने देखा वो ज्यादा चौकस था । बाक़ी सब शांत थे । और उसके उतर जाने के बाद वही तमाम बातें । की ये लोग झुण्ड में शिकार करते है जैसे ये भेडिये के वंशज हो । अरे वो चोर हैं एक आवाज़ उठेगी वो सब के सब अलग अलग हो जायेंगे । ये बात हम कब समझेंगे ।