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Wednesday, April 28, 2010

बस में ठूसी हुई सवारी और कान में हेडफोन

आजकल ऑफिस में बड़े ही अजीब तरह का माहौल है । पता ही चलता कि टाइम पंख लगा कर उड़ जाता है । पता ही नहीं  चलता  कि आने के बाद समय कैसे पास हो गया । और जब ऑफिस से जाने का समय होता है तब पता चलता है अरे अब तो जाने का टाइम हो गया अभी तक तो ब्लॉग का ब भी नहीं लिखा । फिर लग जाता हूँ  जुगाड में मे कि कैसे टाइम निकल कर ब्लॉग को मूर्त रूप दू  । वैसे भी कल ऑफिस अपने समय से थोडा पहले निकला मन में वो चमकता सूरज रात में भी चमक रहा था । और निगाहे रात में भी सूरज को ढूंढ रही थी । पर आज तक  नोर्वे को छोड़ कर रात में कंही कभी सूरज नहीं निकलता ये बात में भूल गया था । में अपनी रफ़्तार में चल रह रहा था । कि स्टैंड तक आराम से जाऊंगा पर मेरे कदमो के साथ यातायात भी रुका हुआ था और इतना कि पैदल चलने लायक भी जगह नहीं बची थी  । पर पैदल चलने वालों को आजतक कोई रोक पाया है जो आज रोक पायेगा । मैं भी दाये बाये करते हुए कार पर चढ़ते हुए अपने रास्ता बना ही लिया और न जाने कितनो ने मेरा अनुसरण किया और मैंने किसी और का किया था । उस समय कार वाले भी कुछ नहीं बोले उन्होंने ऐसा क्यों किया ये मुझे नहीं पता । आज बस स्टैंड कि लाइट खराब थी तो अँधेरा अँधेरा हुआ था । किसी का चेहरा पहचान नहीं पा रहा था और मेरी निगाहें उस खैनी वाले भैया को ढूढ़ रही थी क्योंकि लगभग एक हफ्ते से उनको नहीं देखा था । तो मन में देखने कि एक अजीब सी ईच्छा हो रही थी । आज बस ने कम से कम २० मिनट तक रुला दिया । मेरी वाली छोड बाकी सब आने का नाम ले रही थी और आ कर कर जा रही थी । और उस अँधेरे में हम जैसे मुसाफिर का ध्यान नहीं दे रही थी । उसके बाद बस का आगमन हुआ तो एक साथ झुण्ड के झुण्ड चढ़ने लगे तो बस कि खिडकी से एक सज्जन ने आवाज़ दि कि अरे पीछे २ बस और भी आ रही है । पर उनकी ये आवाज़ सड़क कि आवाज़ में दब कर रह गयी और एक यात्री बस के गेट में । किसी तरह उनको उससे निकला गया तो बस में जान आई और बस ने आगे का गीयर दबाया गया । आगे तो मत पूछो आज बस में अपने आप ठूस ठूस के सवारी अपने आप चड गयी थी । और बस वाले ने बस को सिर्फ उतरने वालों के लिए ही खोलने का निर्णय लिया । ये भी एक तरह का हाहाकार था । उनके लिए जो बस के बहार थे और बड़ी देर से बस का इंतज़ार कर रह थे । तो बस जहाँ रूकती वो आगे या पीछे कंही से भी चड़ने के लिए बेताब हो जाते और मैंने देखा कि एक दो को इसी कारण चोट भी लगी और वो गाड़ी वाले पर गुस्सा भी हो गए । पर इन सब से एक व्यक्ति अनजान था । उसको किसी भी दुनिया कि खबर नहीं थी क्योंकि वो अपने कान में हेडफोन लगा कर मस्ती में आँखें बंद कर के गाना सुनने में लगा हुआ था । उसको ये भी होश नहीं था कि आसपास क्या हो रहा है । और तो और वो गाना सुनने के साथ साथ गाना गाये भी जा रह आता । कभी गाना इंग्लिश का होता तो कभी हिंदी । और सुर माशा अल्लाह वो भी बड़े चुन चुन के निकल रहे थे । और जब किसी के कानो में हेडफोन लगा होता है तो उसके सुर अपने आप तेज हो जाते है जैसे उन जनाब के थे । उनको इसका भी पता नहीं चला कि कब धूल वाली आंधी ने बस पर हमला किया और निकल गयी । मैंने भी स्टैंड आने पर उतरने का फैसला कर ही लिया ।

Tuesday, April 27, 2010

बस का नहीं ऑटो वाले भैया को धन्यवाद

एक बार पुनः आप सभी से क्षमा चाहूँगा कि मैं पुरे ३ दिनों के बाद ब्लॉग पर आया हूँ । इसके पीछे मेरी ही कुछ कहानी है जिसे में बयां नहीं कर सकता हूँ । पर सच मानिये लिखते वक्त बड़ा सुकून मिलता है । आज में सबसे पहले उस ऑटो वाले भैया को धन्यवाद देना चाहूँगा जिसने मेरी जान बचायी । अगर वो सही समय पर ब्रेक पर पैर नहीं रखता तो आज में कंप्यूटर पर ऊँगली नहीं रखता । तो धन्यवाद अनजान ऑटो वाले भैया । हुआ ये था कि सोमवार का दिन था धूप अपने चरम पर थी पता नहीं मुझे  क्या हुआ मैं १० मिनट के लिए ऑफिस के बाहर चला आया और धूप का आनंद लेने लगा मतलब अपने काम से ऑफिस के पास वाले मार्केट में जाने लगा ।  काम करके जब में  मार्केट से वापस आने लगा तो एक गोल चक्कर पड़ता है रास्ता उतना चला नहीं है जितना चलना चाहिए मैंने देखा रोड के दूसरी तरफ एक बड़ी ही सुंदर सी विदेशी महिला ऑटो का इंतज़ार कर रही है । सच मानिये मेरी रफ़्तार को वंही पर ब्रेक लग गया । और एक बात और अपनों मनना पड़ेगा जैसे धूप में शीशा चमता है उसी तरह वो विदेशी महिला चमक रही थी । उसका भी कारण था । उसके कम से कम वस्त्र । उसने सुपर मिनी स्कर्ट पहन राखी थी जिससे उसका आधे से भी जायदा शारीर दिखाई दे रह आता और धूप में चमक रहा था साथ में छोटी सी टीशर्ट जिससे धूप भी टकरा कर शर्मा रही होगी । खुदा कसम वो सच में बाला थी । उम्र कोई २०-२१ कि होगी । मैं बस उसको ही देख रहा था और मेरी सुधबुध खो सी गयी थी । और शायद मुझे ये भी याद नहीं टइ मैं रोड के बीच में चल रहा हूँ कि तभी चीईईईई कि आवाज़ से किसी ने ब्रेक लगायी तो होश आया कि में एक ठीकठाक रफ़्तार वाली ऑटो के ठीक सामने खड़ा हूँ और शायद मेरी उस स्थिति का अंदाजा उस ऑटो वाले भैया ने भी लगा लिया और वो मुस्कुरा कर बोले कि देखो देखने में कोई बुराई नहीं है पर चश्मा लगा कर । मुझे बड़ी झेप का एहसास हुआ । पर एहसास फिर भी ना जागा । अभी भी दिल था कि मानता नहीं वाला हो रहा था । ध्यान रह रह कर उसी तरफ जा रह आता । ऑटो से बचने के बाद दिल धडकन ने गति पकड़ ली थी । पर उसको अब तक ऑटो नहीं मिली थी । उस दिन मुझे थोडा सा पझ्तावा हुआ कि मैं ऑटो वला क्यों नहीं बन गया । पर कोई नहीं दूर के ढोल हमेशा सुहावने नहीं होते । वो मुझे एस खेल कि शातिर खिलाडी लग रही थी क्योंकि सब ऑटो वाले उससे जायदा कि उम्मीद कर रहे थे पर वो अपने कपड़ो के हिसाब से कम कि । पर ऑटो वाले ठीक उसका औलता सोच रहे थे । उनको चाहिए था ज्यादा । मैंने कुछ देर रुकने का मन बनाया और सोचा कि अब ऑटो करा ही दू तो जायदा अच्छा है ।कंही कुछ उल्टा सीधा न हो जाये । इसी क्रम में में एक पेड का सहारा ले कर खड़ा हो गया और सोचने लगा कि कंही ये मोहतरमा अगर बस में चले तो रोज बस में दंगा भड़क जायेगा और रोज अग्निशमन दल को बस में आग बुझाने के  लिए बुलाया जायेगा । पर इसका बस के बाकी लोग  कतई बुरा नहीं मानेगे इतना तो मुझे पक्का विश्वास है । और मैं भी सहमंत हूँ ।  वैसे कई लोगो को मेरा ये व्यव्हार बुरा लग सकता है पर इसमे मेरा कोई दोष नहीं है । अगर आपके चेहरे पर कोई चमकती चीज़ टकराएगी तो आपकी निगाह तो जायेगी ही । और एक बात और कहना चाहता हूँ कि इस व्यक्ति विशेष लक्षण से पता चलता है कि मैं अपने ही पर्यायवाची का नहीं बल्कि अपने बिलोम का प्रेमी हूँ । 

Friday, April 23, 2010

बस में ब्लॉगर और अजीब सी उदासी

कल २ दिनों के बाद जो लिखा उससे मेरे कुछ दोस्त बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे थैंक्स लिखने ले लिए , आज पुरे दो दिनों के बाद कलम उठाई , और बहुत अच्छे जैसे कमेन्ट से मेरा उत्साह बढ़ाया । जिसने सच मैंने मुझे एक नए उत्साह का एहसास कराया है । कल ऑफिस में फिर थोडा बिजी था पर कल और आज दोनों दिन ब्लॉग लिखने का समय निकल लिया । कल ब्लॉग लिख कर बड़ी ही मस्ती के साथ ऑफिस से निकला । अंदर एक अजीब सा उत्साह था । शायद ब्लॉग लिखें कि खुशी थी या शायद कुछ और जो मैंने नहीं जनता । कल वही अपना घर जाने का समय पुराना था । रात के अँधेरे में एक बस का ब्लॉगर निकलता है जिसे लोग विपुल कहते है । वैसे मजाक मजाक मैं ये लाइन बड़ी अच्छी निकली या खराब ये तो आप ही लोग बताएँगे । खैर २ दिनों के बाद वापस स्टैंड पर एक निश्चित समय पर आना बड़ा अच्छा लगा और १-२ चेहरे पुराने लगे थोड़े नए भी आ गए थे ।पर बस स्टैंड का माहौल नहीं बदल था एक नयी चीज़ हुई थी कि चूँकि गर्मी अपने चरम पर पहुच चुकी है तो एक के बजाये दो पानी वाले जरूर खड़े हो गए । जो मेरे सामने रहते तक बिजी रहते है । उनको साँस लेने तक कि फुर्सत नहीं रहती है । मेरे ये समझ में नहीं आता ही लोग कितने प्यासे है । चलो इसी बहाने कम से कम उनका तो काम चल जाता है और रोज़ी रोटी भी । लगभग १५ मिनट खड़े होने के बाद बस का आगमन हुआ ।  मेरी नज़र उस खैनी वाले को ढूंढ  रही थी ।   वो मुझे आज नहीं दिखाई दिया । मैं बस के अंदर था और एक कोने में खड़ा हो गया था । आज अंदर से मन कुछ उखड़ा उखड़ा स लग रह आता । पता नहीं क्या चीज़ थी जो मुझे कम लग रही थी । और कुछ न होने का एहसास दिला रही थी । शायद उसका नाम मुझे नहीं पता था । में रह रह कर तडप रहा था और उसका नाम मेरे जेहन में नहीं आ रहा था । लगभग १० मिनट बाद मुझे सीट नसीब हुई पर ये खुशी भी मुझे ज्यादा देर नसीब नहीं रही और एक बुजुर्ग के आने के बाद वो उनके नसीब में स्तान्तरित हो गयी । मुझे कभी कभी बड़ा कोफ़्त होता है कि जब कोई अच्छी डील डोल वाली युवती बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में इंग्लिश के २ शब्दों में अपने उठने कि प्रार्थना करती है तो जब नारी के आगे विश्वामित्र कि नहीं चली तब तो में साधारण मानव हूँ जिसके अंदर मेरा स्वयं का दिल धक् धक् करता है । पर में किसी महिला के बजाये किसी बुजुर्ग या उम्र दराज महिला को सीट देना ज्यादा सही सोचता हूँ । और मैं खुद महिला सीट पर  बैठने से परहेज़ करता हूँ और खड़े हो कर यात्रा करना ज्यादा पसंद करता हूँ । बाकी का सफर मेरा खड़े खड़े गुजरा जिसका मुझे कतई भी गुरेज नहीं है । क्योंकि मेरे से ज्यादा बुजुर्ग को सीट कि जरूरत थी । वैसे मेरे जैसे बस में मैंने कई लोंगों को देखा है जो स्वेक्षा से अपनी सीट बुजुर्ग महिला और पुरूष के लिए छोड देते है  । तब मुझे और खुशी होती है । और कुछ लोग मुझे बस में बड़े अछे लगते है क्योंकि वो बस को संगीतमयी बना देते है । उनके नेपाली फोन में लगा बड़ा सा स्पीकर वो ऑफिस से निकलते ही आन कर देते है और पूरे रास्ते वो सबका मनोरंजन करते हुए जाते है । उनको इससे कोई मतलब नहीं कि किसी के साथ कितना चचा हुआ होगा पुरे दिन या कितना बुरा हुआ होगा वो अपनी मस्ती में चूर रहते है । इसमे मैंने कई बुजुर्गो  को भी देखा है जो बस में अपने समय के हिट गानों को सुनते है और अपनी  ही मस्ती में खोये रहते है । आज खड़े खड़े यात्रा करने में भी एक नया ही आनंद और सुख था । 

Thursday, April 22, 2010

रात में बस का सफर और फोर्मुला वन का अनुभव



आज पूरे दिनों के बाद आपके सम्मुख हुआ हूँ । पिछले दो दिनों से कुछ भी न लिखा पाने का क्षमाप्राथी हूँ । पिछले २ दिन ऑफिस के काम में कुछ ज्यादा ही उलझा हुआ था जिसके कारण मैं अपने निजी ब्लॉग को अपडेट नहीं कर पाया । जिसका मुझे स्वयं बहुत दुःख है । ऐसा नहीं था की मैं ऑफिस के काम मैं इतना खो गया था की मैं थोडा समय भी नहीं निकाल सकता था । पर वो कहते है हरी खोजन को हरी चले हरी पहुचे  हरी पास । कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ जब लिखने का मन करता तो कंप्यूटर खली नहीं मिलता और जब कंप्यूटर खाली मिलता तो लिखने का मन नहीं होता । आज दोनों का मिलन हुआ है तो पुरे दो दिनों के बाद आपके सम्मुख फिर से आया हूँ । मंगल मेरे लिए कुछ खास नहीं हुआ वही ऑफिस की भागदौड और वही काम । जब जाने का समय हुआ तो एक और प्रोजेक्ट चलो उसको भी खत्म किया और जाने की तैयारी शुरू की । जब समय देखा तो थोडा ज्यादा ही बता रहा था । फिर भी मैंने बहुत दिनों के बाद रात में ही बस का सफर करने की सोची । ऑफिस से स्टैंड पर जब पंहुचा तो आज का द्रश्य कुछ और था । और दिन यंह पर भीढ़ हुआ करती थी पर उस दिन सन्नाटा पसरा हुआ था । स्टैंड पर कोई नहीं था । मुझे लगा कंही मैंने आज कोई फैसला गलत तो नहीं ले लिया । लगभग १०-१५ खड़े होने के बाद मैंने देखा की ऑटो वालों की तो लाइन लगी हुई है और वो सब के सब मुझे अपने संभावित सवारी समझ कर मेरे आगे धीरे हो जाते थे । पर मैं तो बस का मुरीद । जैसे गोपियाँ कृष्ण की । कोई भी ऑटो वाला मेरा मन नहीं बदल पाया । मेरे ख्याल से उनकी बहुत से बद-दुआ मुझे लगी होगी । पर मेरा मन तो मेरी बस ले कर अपने साथ चल चुकी थी और अब तक मेरे सामने नहीं आई थी । उफ़ काश मैंने आज फिर कार मांग ली होती । मैंने सोचा था की बस मेरे सामने कड़ी हो गयी । और लग रह आता की जैसे मुस्कुरा रही है की आओ बैठो । मैंने उसकी इस अदा को भापा और बड़े प्यार से चढ गया । बस में ज्यादा सवारी नहीं थी । मेरे ख्याल से सब बस प्रेमी ही थे मैं टिकेट ले कर अपनी सीट पर बैठ गया । देखा कुछ लोग बस में लगभग सो चुके है । कुछ तो इतने गंभीर मुद्रा में सो रह थे की उनको इस बात का पता भी नहीं चलता था की बस कब रुकी और कब चल पड़ी । और लोंगो को मैंने बागी ही अजीब मुद्रा में सोते हुए देखा । किसी की टांग कंही और हाथ कंही और थे पर वो सोते हुए बड़े अच्छे लग रहे थे । मुझे  उस दिन कैमरा वाले फोन की कमी सच मैं खली । पर कोई नहीं मेरा कोई हक नहीं बनता की मैंने बस में सोते हुए लोंगों की पिक्चर को अपने ब्लॉग में लगाऊं । टिकेट काटने  वाले अंकल भी आधे सो आधे जाग रह थे । पर बस का ड्राईवर पूरी तरह सचेत था । जिसकी मुझे सबसे ज्यादा खुशी थी की ड्राईवर को अपने फर्ज की कितनी चिंता है  । वो अपनी पूरी शिद्दत के साथ बस को खाली सड़क पर फोर्मुला वन कि तरह चला रहा था । ड्राईवर से मुझे  फोर्मुला वन कि किसी कार मैं बैठे हुए सवारी या साथी का एहसास दिला रह आता फोर्मुला वन क्योंकि बस में हम दोनों ही पूरी तरह जाग रह थे । बाकि सब तो निद्रा में खोये हुए सपनो कि दुनिया मैं खोये हुए थे । आज रात्रि के सफर में मज़ा बहुत  आया । समय का तो पता नहीं चला और न जाने कितनी जल्दी मेरा स्टॉप आ गया ।  स्टैंड पर बिताया हुआ १५ मिनट बस वाले कि रफ़्तार ने कवर कर दिए थे । काश रोज ड्राईवर इसे ही और इतने रफ़्तार में मुझे ऑफिस से घर पंहुचा दे तो क्या कहने । यही सोचता हुआ मैं अपने स्टॉप पे उतर गया ।

Tuesday, April 20, 2010

खाली बस का आनंद और राजसी सुख का एहसास

कल का दिन वैसे सभी लिहाज़ से शनिवार और रविवार से अच्छा था । कम से कम सोमवार को वो सब नहीं हुआ जो रविवार और शानिवार को हुआ था ।पूरा दिन अच्छे से गुजर गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो । कब १० बजे कब १२ और कब ५ पता ही नहीं चला । हालाँकि काम कुछ खास नहीं किया पर जो किया वो लगन के साथ किया । तो वही वाली बात याद आ गयी की समय बितते देर नहीं लगती । कुछ ऐसा ही सोमवार को हुआ था । मैं भी सोमवार के खतम होने का इन्तजार करने की इच्छा नहीं हुई वो तो अपने आप ही तेजी से खतम हो गया । और मेरे जाने का समय नजदीक आ गया व् कल मेरे एक और मजेदार बात हुई कल मेरे ऑफिस में सबको पता चल गया की मैं एक ब्लॉग का मालिक हूँ । क्योंकि जब में कल का ब्लॉग लिखने में मग्न था तब भी न जाने कब मेरे बॉस मेरे पीछे आ कर विराजमान हो गए पता नहीं चला । और जब तक पता चलता तब तक देर हो चुकी थी । खैर उन्होंने एक ही बात कही की तुम भी ये फालतू चीजों में यकीन करते हो । मैंने कहा सर बड़े बड़े आदमी ऐसा करते है तब तो मैं एक अदना सा इंसान हूँ । उनका दूसरा सवाल था कोई पढता है या नहीं ।या इसे ही ऑफिस में कोई काम नहीं तो लगे लिखने ।मैंने उन्हें आश्वासन दिया की सर कुछ मेरे जैसे ही पढ़ने वाले है जो नित्य मेरा ब्लॉग बड़े चाव से पढते है । ये अलग बात है की कमेन्ट करने में कतराते है । और मुझे उनको खोद खोद कर कमेन्ट लेना पड़ता है । वो भी हसते हुए चले गए और बोले लिखो और लिखो जब कोई न पढे तो हमें बता देना । पर मेरा लिखा उससे प्रभावित नहीं हुआ । मैं उतने ही लगन से लिखें में लगा हुआ था । पता नहीं क्यों आब ये मेरे शाम के समय का एक हिस्सा बन गया है । जिसे में रविवार को मिस करता हूँ । फिर ब्लॉग लिखने के बाद पोस्ट किया और घर जाने की तैयारी भी कर ली । ऑफिस से स्टैंड तक बड़े मज़े में पहुचा । स्टैंड पहुच कर देखा की अभी अभी एक बस निकली है वो भी खाली तो मुझे बड़ा खराब टाइप का लगा । की उफ़ खाली बस थी सीट का भी कोई झंझट नहीं होता और मज़े में घर पहुच जाता । पर होनी को कुछ और लिखा था । लगभग १० मिनट पर मेरी आँखों का विश्वास नहीं हुआ । मैंने आँखों को मलने का प्रयास किया पर वो भी सफल नहीं हुआ क्योंकि जो देखा वो सच था । सामने से पूरी की पूरी बस खली मेरे पास चली आ रही थी । और मेरे सारे शरीर में खून की रफ़्तार को तेज कर रही थी । पर वही हुआ जो होना था बस मेरे स्टॉप पर रुकी और उसने मेरे लिए अपने गेट खोल दिए । मुझे बिलकुल रेड कारपेट वाला अनुभव हो रहा था । जैसे में बस का उद्घाटन कर रहा हू । टिकेट ले कर मैं बहुत दिनों के बाद इस बात का चुनाव नहीं कर पा रहा था की किस सीट पर आज बैठू । क्योंकि मेरे साथ कोई ४-५ लोग और चढ़े होंगे ।उनकी भी हालत मेरी जैसी ही थी । वो भी थोड़े भ्रमित टाइप के हो गए होंगे । क्योंकि इस टाइम पर ऐसा चमत्कार बिरले ही होते है । वो कहवत है न की “बिल्ली के भाग्य से छींका फूटा” । आज हमरी किस्मत थी ।उसके बाद तो पूरी बस राजसी सवारी बन कर चली जा रही थी । मैं सबसे आगे की सीट पर बैठ गया । ये सीट कल बिलकुल बग्गी का एहसास दिला रही थी । और पता नहीं क्यों मुझे बड़ा गर्व लग रहा था उस सीट पर बैठ कर । मैं जितना सुख ले सकता था वो मैंने लिया उसके बाद स्टैंड आने पर अपनी सीट को बड़ी मुश्किल से खाली किया ।

Monday, April 19, 2010

बस हुई खराब और रविवार हुआ बर्बाद

पता नहीं कभी कभी मुझे क्या होता है की मेरा मन अचानक किसी काम में नहीं लगता है ।  और कभी कभी ऐसा होता है मन या तन मन धन सब के सब उसी में लगता है । इसका कारण मैं आजतक नहीं जान पाया । और आगे का भी कोई इरादा नहीं लगता । इसका भी कारण पता नहीं है । शनिवार को काम कुछ नहीं था । बस चंद लाइन का काम करके परे दिन फरारी कटी ऑफिस में । कभी इधर जाता  कभी उधर जाता । क्योंकि कोई काम नहीं था और अगर बॉस के सामने आता तो वो कोई न कोई काम थमा देते जो मुझे करना पड़ता । इससे अच्छा था की झूठे काम का बहाने बनाते रहो और टाइम पास करो । जैसे तैसे दिन पल पल कट रहा था । हर पल पल पल पर भारी था ।  कभी तो पल मुझे पर भारी पड़ता तो में सोफे पर भरी हो जाता । और झूठे चिंतन की मुद्रा बना कर पल पल को धोखा देने की कोशिश करता । कभी खुद को लगता की सफल हो गया तो कभी लगता नहीं यार थोडा और काम करना है अभी । चलो जैसे तैसे करके शाम में ५ बजे घर जाने का प्लान बना । अब तो बैचेनी और बढ़ गयी थी । ऑफिस से निकला तो लगा क्यों निकल आया । ऑफिस में ही अच्छा था । मुझे जादू का वो संवाद याद आ गया धूप । रोड आज उतनी ही खाली थी जितनी अन्य दिनों भरी रहती है । मैं भी जादू को याद करता हुआ बस स्टैंड की तरफ रवाना हो गया । सोचा की शायद बस जल्दी मिल जाये तो काम बन जाये और में ऑफिस से घर  जल्दी पहुच जाऊ पर हाय रे मेरी किस्मत । ऐसा उस दिन भी नहीं हुआ । में बस स्टैंड पर खड़ा खड़ा धूप धूप करता रहा और बस उतनी ही देर से आई और जब आई तो सारी उम्मीदों पर पानी फेरती हुई आई । क्योंकि बस ठसाठस भरी हुई थी । और बड़ी मुशील से एक सुरक्षित जगह पर खड़े होने लायक सीट मिल पाई । अब तो थोडा थोडा गुस्सा भी आ रहा था की ऐसा मेरे ही साथ होता है या कोई और भी इसका भागीदार है जिसे मुझे ही ढूंढ कर अपना गम बांटना पड़ेगा । बस आज अपने रफ्तार पर थी और मुझे लगा की अगर ऐसी ही बस चलती रही हो शायद ये आधे घंटे में मुझे अपने स्टॉप तक पंहुचा दे । पर वो कहावत है न की जब आपकी किस्मत खराब हो तो ऊंट पर भी बैठ जाओ कुत्ता जरूर काट खायेगा । वही कुछ हुआ मेरे साथ । १५ मिनट बाद ही बस खराब हो गयी । और बस ने न चलने की कसम खा ली । अब तो गुस्से के से मेरे साथ साथ कई लोंगो का परा तापमान का साथ दे रहा था । और शायद तभी उस दिन रिकॉर्ड गर्मी थी ।पूरे १ घंटे के करीब धूप धूप करने के बाद बस ने अपनी पुरानी चाल पकड़ी पर इस  बार बस नयी थी मतलब दूसरी थी । और मज़े की बात ये थी की इस बार में सीट पर बैठा था और जो पिछली बस में बैठा था वो खड़ा था । मुझे अंदर से थोडा थोडा अच्छा लगने लगा था । इसमे मेरी कोई गलती नहीं है की मैं बैठा ये उस महोदय का ही निवेदन था की मैं बैठ जाऊ । क्योंकि उनका कहना था की वो दिन भर बैठे ही रहते है । तो उनको बस में बैठना उतना पसंद नहीं है । तो उन्होंने अपनी सीट स्वेच्छा से मुझे दे दी । मैं भी बड़ी इच्छा से उस पर विराजमान  हो गया । और तब तक रहा जब तक मेरा स्टैंड नहीं आ गया । पर उस दिन का बुरा साया रविवार तक मेरे साथ रहा । जिसने मेरा रविवार बर्बादवार बना दिया ।

Saturday, April 17, 2010

बस में चोरी और सब के सब शांत

कल ऑफिस से जाते वक्त एक बड़ी अच्छी घटना घटी । उससे पहले बता दू की ऑफिस का दिन बड़ा अच्छा था । कुछ खास हुआ नहीं ऑफिस में । घर जाने का वही पुराना समय चुना और बस की भीढ़ में शामिल हो गया । आज स्टैंड कुछ कुछ मज़ेदार नहीं था । भीढ़ उतनी नहीं थी । और न ही वो खैनी वाले भैया दिखाई दिए । हो सकता है वो आज पहले चले गए हो । मैं बस का इंतज़ार करने लगा । थोड़ी देर में बस भी आ गयी । बस पहले से भरी थी स्टैंड पर आकर वो और भी भर गयी । चड़ने में थोड़ी में थोड़ी म्हणत लगी पर आखिरकार स्टैंड का एक एक आदमी बस में चढ गया । चलो टिकेट ले कर एक सुविधाजनक स्थान देखने की तैयारी करने लगा । वो मिल भी गई । कुछ देर तो बस में कुछ नहीं हुआ । तो में सोचने लगा की क्या कल का ब्लॉग खली रहेगा । मैंने सोचा की अभी तो बस में चढा हू अभी तो पुरे १ से ज्यादा घंटे का सफर है कुछ न कुछ तो होगा ही । मैं यही सोच कर अंदर बाहर देखने लगा । पता नहीं ऐसा मुझे ही लगता है या कुछ और भी है की जब में बस में होता हू तो बाहर अच्छे अच्छे लोंगो को देखता हूँ । जब बाहर होता हू तो बस में अच्छे लोंगों  को देखता हूँ । कार में होता हू तो ऑटो में अच्छे लोंगो को देखता हूँ ऑटो में होता हूँ तो कार में तो हमेशा ही अच्छे लोंगो को देखता हूँ । मैं इससे अनजान हू की मेरे साथ ही ऐसा होता है या कोई और भी इसका भुक्त भोगी है । बस इसी उधेड़बुन में बस का सफर चल रहा था । पता ही नहीं चला कब समय का पहिया घूमता गया और मैं अपने घर के पास पहुच  गया । पर होनी को मेरे ब्लॉग पर कुछ तो लिखवाना था उसके लिए में ब्लोगमाता का धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्गोने अचानक आ कर कुछ ऐसा करवा दिया की पूछो मत । हुआ ये की सन्नाटे को चीरती हुई एक चीख निकली । चीक सुन के लगा किसी का क़त्ल हो गया । पर सनसनी फुनफनी हो गयी । किसी ने किसी की जेब में हाथ मारने की कोशिश की थी और एक महिला ने उसका सजीव प्रदर्शन देख कर चीख निकाल दि थी । उस घटना में चीख ही सबसे अच्छी थी । बाकि सब बेकार क्योंकि जिसकी जेब पर हाथ मारा गया वो कुछ नहीं कर पाया । वो महिला बार बार इशारा कर रही थी की ये चोर है इसने हाथ मारा था पर निरह भीढ़ वही कौन कौन करती रही । बस के दोनों गेट बाद थे । पर फिर भी कोई सीधे हाथ नहीं मार रहा था सब सिर्फ कौन कौन कर रहा था । कोई भी उस चोर को सीधे हाथ नहीं पकड़ रहा था । हालाँकि वो चोर अपना काम पूरा नहीं कर पाया था इस लिए जिसके साथ ऐसा हुआ उसका सब कुछ सुरक्षित था । तो उसको कोई चिंता नहीं थी वो भरी हुई बस में धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था । जबकि सबसे ज्यादा उसको चिंता और सजग रहना था । उसको इन सबसे कोई मतलब नहीं था वो तो बस अपनी दुनिया में मग्न था । लग्बह्र ये सिलसिला ५-६ मिनट चला होगा । पर हुआ वही ढाक   के  तीन पात । उसके बाद जो स्टैंड आया उसमे वो चोर बड़ी ही शांति के साथ नीचे  उतर गया । सब देखते रह गए । मुझे कल के दिन और उस दिन में कुछ ज्यादा अंतर नहीं लगा क्योंकि उस दिन भी एक ही आदमी ने आवाज़ उठाई आज भी एक ने ही आवाज़ उठाई । उस दिन जिसके साथ हुआ वो ज्यादा चौकस था आज जिसने देखा वो ज्यादा चौकस था । बाक़ी सब शांत थे । और उसके उतर जाने के बाद वही तमाम बातें । की ये लोग झुण्ड में शिकार करते है जैसे ये भेडिये के वंशज हो । अरे वो चोर हैं एक आवाज़ उठेगी वो सब के सब अलग अलग हो जायेंगे । ये बात हम कब समझेंगे ।

Friday, April 16, 2010

बस में शराबी या शराबीओं की बस

कल के प्रेम मिलन के ब्लॉग पर जाने के बाद मिली उन तमाम टिपणी से मेरा ब्लॉग और पूरा शरीर जिसमे बहुत से अभिन्न हिस्से है वो सब खुश है बिलकुल मोगेम्बो की तरह । खैर आज पूरे दो दिन के बाद अपनी रेगुलर बस से ऑफिस आया हूँ । बड़ा अपनापन फील हो रहा था । बस में वही सभी चेहरों को देखते हुए बड़ा फील गुड टाइप का हो रहा था । उसने ऑफिस भी सही टाइम पर पंहुचा दिया । और बखुदा ऑफिस भी बड़ा मस्त रहा पूरे दिन । वही थोडा काम थोडा आराम उस पर थोड़ी मस्ती का बीच बीच में छौंक । पूरे शरीर में एक नयी मस्ती का एस दिलाती है । कल जब ऑफिस से घर जा रहा था तो रास्ते में ऐसा कुछ खास नहीं हुआ  जिसे में लिखू । पर बस के इंतज़ार में जरूर ऐसा हुआ लिखने लायक है । एक बहुत ही बुजुर्ग महिला लगभग उन्होंने ८५ से ज्यादा पतझड़ देख लिए होंगे आराम से बड़ी ही मस्त चल से बस क इंतज़ार कर रही थी । उनकी चल से आप ये नहीं कह सकते थे की उनकी उम्र इतनी होगी । पर वो गलत स्टैंड पर सही बस का इंतज़ार करते करते जब थक गयी तो आखिर उन्होंने पूछ ही लिया की फलां बस कब और कान्हा से मिलेगी । चूँकि वो गलत स्टैंड पर थी ओ कुछ लोंगो ने उनको सही रास्ते से परिचित कराया और बिना किसी देर किया चली गयी । मुझे उनकी चल से ले कर ढाल तक सब अच्छी लगी । कमर थोड़ी झुकी थी पर चाल में कोई कमी या खोट नहीं कह सकते थे । और तो और उनकी चल किसी ५० वर्षीय पुरूष से कम नहीं थी । वो जब गयी तो उनके लंबे लंबे पग इस बात को चीख चीख कर कह रह थे । कुछ देर बाधी वो आँखों से ओझल हो गयी और बस में चड़ने का झोल दे गयी । चलो हम भी दूसरों की तरह बस में चढ कर भीढ़ का हिस्सा हो गए । और कल की तरह प्रेम का सेमिफाईनल देखने के लिए बेताब था पर किन्ही कारणों से मैच रद्द हो चुका था । शायद इस बात को मेरे साथ कईयों को अफ़सोस होगा । कल जो हुआ उसके बाद वो मलाल भी चला गया । बस की सवारिओं में से किसी २ लोंगो ने कुछ ग्राम मदिरा (पीने वाली देखने या बोलने वाली मंदिरा नहीं) का सेवन किया हुआ था । तो उनको बस भी गमहीन लग रही थी । उसके बाद उनके वही रेट रटाये डाइलोग की तुम मेरे भाई बाकि सब हाई हैं । मुझे पियक्कड लोंगो के ये बात सबे ज्यादा अच्छी लगती है की २पेग अंदर उसके बाद वो सिकंदर । उनको किसी की परवाह नहीं होती । चाहे फिर प्रधानमंत्री क्यों नहीं आ जाये । मैं इसका भुक्त भोगी रह चुका हू । तो मुझे इसका कुछ ज्यादा ही तजुर्बा है । मेरा एक मित्र हुआ करता था आज कल मुझसे दूर है । वो विशुद्ध हिंदी वासी रहता था मगर और सिर्फ मगर जब वो पीता नहीं था पीने के बाद तो लगता था जैसे महरानी विक्टोरिया के वंसज हो । धाराप्रवाह इंग्लिश बोलता था । मुझे ये आज तक नहीं पता चला ऐसा कैसे हो सकता है । ये यकीन न होने वाली बात है पर ये सच है । ऐसा कुछ बस में हुआ था वो भी पूरा का पूरा इंग्लिश का ज्ञान बस में ही निकाल रहा था । और हिंदी में सिर्फ इतना ही बोलता की चाहे जितनी महगी हो शराब में तो पिऊंगा मेरा दोस्त जो है । आखिर कमाता क्यों हूँ । आखिरी शब्द सुन कर मुझे उसके घरवालों का ख्याल आता होगा क्या शराब बनाने वाले उसके घर पोअर जा कर देखेंगे की एक शराब पीने से उसके घर में रोज क्या क्या होता है । सरकार भी बेबस है क्योंकि टैक्स देने वालों से ज्यादा लोंग शराब पीते है और टैक्स से ज्यादा उनको शराब में मुनाफा आता है । तो क्यों वो सोने की अंडा देने वाली मुर्गी की गर्दन काटे । वो तो भला हो कुछ महापुरुषों का जो उपर जाते जाते कुछ नेक काम कर गए और साल के कुछ दिन ड्राइ दे के नाम हो गए । पर पीने वाले उससे दो कदम आगे रहते है वो एक दिन पहले स्टोर कर लेते है । उनका ये शराब साहित्य चल रहा था पर मेरा स्टॉप आ गया था और मुझे उन बाकी लोंगों पर रोना 

Thursday, April 15, 2010

प्रेमी प्रेमिका का मेल और बस में खेल

आज का और कल का पूरा दिन मस्त था । ज्यादा काम भी नहीं था और ज्यादा आराम भी नहीं था । सांस ले भी सकता था और छोड़ भी । पूरा दिन ऑफिस की मातापच्ची में गुजर गया । फिर आज मेरी खुमारी भी उतर चुकी थी । तो दिमाग अपनी पूरी रफ्तार पर दौड रहा था । आज मैं अपने आपको कुछ ज्यादा ही एक्टिव महसूस कर रहा था । जैसे कुछ ज्यादा ही शक्ति वाली गोलिया खा ली हो । ऑफिस से निकला तो आज रफ़्तार भी ज्यादा थी । कदमो ने समय से पहले स्टैंड पर पंहुचा दिया । आज कुछ चेहरे नए और पुराने थे । वो खैनी वाला बंदा आज फिर दिखाई दिया । उसकी मुझे एक अदा बड़ी अच्छी लगती है की उसको दुनिया की कोई चिंता नहीं है । वो बस अपनी उँगलियों को अपनी हथेली पर मलता है और उसकी सारी चिंताए दूर होती हुई लगती है । और लगता है वो खैनी से समाधी को ओर जाता हुआ लगता है । ओर लगता है की हर बार उसे मोक्ष की प्राप्ति हो गयी । बस आ चुकी थी ओर में बस के अंदर था । आज का द्रश्य थोडा अलग था । बस के कोने में १ प्रेमी ओर प्रेमिका दुनिया को पूरी तरह से ठेंगा दिखाते हुए इश्क करने में मशगूल थे । उनको इसकी खबर ही नहीं होगी की कल कोई ब्लॉगर उनके बारे में लोंगो को बता भी सकता है । टिकेट ले कर मेरा सौभाग्य उनके पास जाने का हुआ । उनकी बात बड़ी ही मनोरम थी । उनको एस बात का कोई मलाल नहीं था की वो एक सार्वजनिक बस में जिसमे वो एक गैर सार्वजनिक हरकत कर रहे है । पर किसी ने कहा है की प्यार अंधा होता है । पर मुझे व्यत्गित रूप से लगता है की प्यार करने के बाद इंसान अंधा हो जाता है । उसको कुछ खबर नहीं होती दुनिया की ।  खबर होती है अपनी प्रेमिका की हर छोटी बड़ी चीज़ । उसे वो भूल नहीं सकता चाहे वो अपने घरवालों की दवाई भूल जाये उसे उसका मलाल नहीं होगा पर प्रेमिका की कोई चीज़ अगर भुला तो वो यही कहेगा हे भगवान मुझे उठा ले । पर ऐसा वो घर के लिए नहीं कहेगा । खैर उनमे बस कुछ ही चीज़ की कमी थी वर्ना उन्होंने तो उसे पूरा अपना घर ही समझ लिया था जिसमे कोई नहीं था । हालाँकि देखने वालों को फ्री में शो देखने को मिल रहा था वो स्थिति कुछ विचित्र थी । मेरे ख्याल से मेरे ओर कुछ ओर लोंगो के लिए व् मैं ये नहीं कहता की मैं ढूढ़ का धुला हू पर हाँ पानी से जरूर सुबह खुद को धो लेता हूँ । मेरा उनमे एक बात को ले कर संदेह हो रहा था की उन्होंने क्या खाया ओर पीया होगा जो उनको सब्र नहीं था व् वो एक दूसरे को बड़े ही प्रेम से आलिंगन करते , ओर भी कुछ कुछ करते पर लिखने में उनका बयां नहीं कर सकता था । हालाँकि दिल्ली बड़ी अच्छी अच्छी जगह है इस तरह के प्रेम को व्यक्त करने  की पर उन्होंने बस का चुनाव क्यों किया ये संदेह से भरा है । क्या उनके पास पैसे को कमी रही होगी ? पर शक्ल सूरत से तो ठीक थक घर के लगते है । या इसके पिछे कोई गूढ़ कारण  रहा होगा । इसका मुझे पता करने की बड़ी जिज्ञासा थी । आजकल मोबाइल फोन के होने कारण हर सस्ते से सस्ते फोन में कैमरा आने लगा है जिसका फायदा कल १-२ ने उठाने की कोशिश की पर ये कोशिश प्रेम के चहेतों ने पूरी नहीं होने दि ओर उनको मन कर दिया । मुझे ये लगता है की अगर उनको सीट न मिली होती तो क्या फिर भी वो ऐसा करते या फिर न करते । क्या ये सीट का खेल था या प्रेम का मेल था । हालाँकि ये मेल और फिमेल का खेल था जिसे पूरी बस ने सजीव देखा और मेरे ख्याल से ये उनके रात में दुर्स्वपन बन कर जरूर आया होगा । मेरा स्टॉप आ गया था पर उनका नहीं । उनका खेल अब सेमिफाइनल पार कर चुका था ।

Wednesday, April 14, 2010

बस में बिना टिकट की सवारी और उनकी बहस

आज में आपको अपने ऑफिस से जाने की कहानी कहने के बजाये घर से ऑफिस आने की कहानी कहने जा रहा हूँ । लोंगों को भ्रम है है की लड़के की आमतौर पर बदमाश या कामचोर होते है पर ऐसा नहीं है । कामचोरी की कोई उम्र , कोई जातपात , कोई धर्म नहीं होता । यहाँ तक की कामचोर कोई भी हो सकता है चाहे वो लड़का हो या लड़की । इसके लिए कोई सीमा निर्धारित नहीं है । हालाँकि मैंने ऐसा सुना था पर अपने आँखों से नहीं देखा था । और मैंने न ही कभी विश्वास किया था । रोज की तरह ही में पाने घर से बस पकड़ने के लिए सही समय पर निकल जाता हूँ पर उस विदेशी महिला ने पिछले २-३ दिनों में मेरी नींद और चैन से साथ खिलवाड़ कर दिया है । उसका असर मुझे अभी तक लगता है और उसी के कारण में आज बस पकड़ने में लेट हो गया । और अपनी नियमित बस को मिस कर दिया । और बहुत सी नियमित सवारिओं को भी । चलो कोई नहीं आज कोई और ही सही । मैं भी दूसरे बस में चढ गया और सोचा चलो थोडा बदलाव  का आनंद लिया जाये । बस में कुछ खास भीढ़ नहीं थी । पर सीट भी नहीं मिली । मैं शाम वाला दिमाग सुबह लगाया और अपने संभावित सीट के पास खड़ा हो गया । सुबह सुबह बस का माहौल बड़ा रंगीन हो गया था बस में । सभी की गर्दन में बल पड़ गए थे । आप समझ ही गए होंगे क्यों । चूँकि ये परिवारिक ब्लॉग तो नहीं पर इसे  सभ्य लोग पढते है तो सबका दिमाग चल ही गया होगा की में किस ओर निशाना लगा रहा हूँ । बस ला माहौल धीरे धीरे नरम से गरम होता गया । पर हाय सीट न मिली । पर मुझे उसका कोई गम नहीं था । अब बस में अच्छी खासी भीढ़ हो चुकी थी । बस में ठसाठस भीढ़ हो चुकी थी । ओर लोग एक दूसरे पर धक्को की भरमार कर रहे थे । की तभी बस ने फ़िल्मी अंदाज़ में ब्रेक लगायी । ओर ४-५ लोग फ़िल्मी अंदाज़ में फौज वालों की तरह चढ़े ओर सामान्य आदमी की तरह टिकेट चेक करने लगे । ऐसा देख कर मुझे अपने हाइ स्कूल के दिन याद आ गए । उन दिनों बी.जे.पी का राज हुआ करता था ओर नक़ल विरोधी दस्ते स्कूल में छापा मारते थे । और जो छात्र पकड़ा गया उसको सीधे जेल की हवा । कुछ ऐसा ही नज़ारा आज बस में था । जितनी तत्परता के साथ उन लोगों ने बस में चढ़ी सवारिओं से टिकेट मांगना शुरू किया वो देखने वाला था । सब लोग अपना अपना टिकेट दिखने लगे । तभी आवाज़ आई भाई साहब इधर आइये । उनको एक शिकार मिल गया था । चलो उन लोंगो ने किसी को तो पकड़ा और उनका मिशन सफल हुआ । उस पर २००-३०० का जुरमाना लगाया गया । वो जनाब बहुत शरीफ थे बिना किसी चुचपड के उन्होंने जुरमाना अदा कर दिया । टिकेट चेक करने वाले भी बड़ी शराफत के साथ उनका चालान काटा । वो लोग ये प्रक्रिया कर ही रहे थे की तभी एक आवाज़ और आई की  एक और है । अब सबकी गर्दन दूसरी तरफ ही गयी । दूसरा शिकार शिकार नहीं शिकारिन निकली । वो अच्छे घर से संबंध रखने वाली लग रही थी और पढ़ी लिखी होने का सबूत दे रही थी । पर वो कहते है न की आप किसी को पढ़ा लिखा सकते है समझ और अकलमंदी वो खुद ले कर आता है । और मेरे ख्याल से वो ले कर आज नहीं आई थी । और साथ मैं अपना पास भी भूल गयी थी ऐसा उनका कहना था । पर चोर पहली बार चोरी करता क्यों न पकड़ा जाये चोर चोर होता है । उन महिला ने अपनी गलती को नहीं स्वीकार की उन्होंने टिकेट नहीं लिया उपर से झूठ पर झूठ बोले जा रही थी की उनके पास पास है और वो घर भूल गयी है । उस पर से बोल रही थी की अब वो टिकेट ले लेती है । पर ऐसा अब संभव नहीं था । जब उन्होंने देखा की उनकी बातों की दाल नहीं गल रही है तो उन्होंने वही पुराणी राजनितिक चाल  चल दि की आपको एक लड़की से एस तरह पेश नहीं आना चाहिए । आपके पास जरा सी भी तमीज नहीं है । पर वो टिकेट चेकर भी बड़े घाट चाट का पानी पिए हुए थे । उन्होंने उस महिला की एक भी चल को कामयाब नहीं होने दिया । आखिरकार उन महिला से भी जुरमाना वसूला गया । मुझे एक बात समझ में नहीं आई की इतनी बहस की क्या जरुरत थी । जब उन महिला को इतना ज्ञान था तो वो टिकेट ले कर क्यों नहीं बैठी और अगर वो पकड़ी गयी गयी तो उसने इतनी बहस क्यों की । चुपचाप जुरमाना   दे कर  क्यों नहीं चली गयी ।  उसके बाद जो बस चली तो सबकी निगाह उन दोनों पर थी और चर्चे भी उन दोनों के ही थे ।

Tuesday, April 13, 2010

सुध-बुध खोई पर तू न गयी मेरे मन से

कल की खुमारी अभी तक दिमाग में एस तरह बसी हुई है जैसे कोई खराब गंध बस जाती है । उस दिन रात को देर से नींद आई और चूँकि अगले दिन ऑफिस की चट्टी थी तो नींद भी जल्दी खुल गयी । क्या ऐसा मेरा ही साथ होता है या सबके साथ साथ होता है मैं इससे अभी तक अनजान हूँ । पर उस दिन एक अलग ही खुमारी थी । कभी कभी वों खुशबु मुझे अभी तक अंदर तक हिला देती है । पर अब किया भी क्या जा सकता है । बीती की बिसर कर आगे की सुध लेई । मैं भी कुछ इसी तरह की विचारधारा ले कर चल रहा था । कुछ इस तरह के विचारों में सन्डे बीत गया । और मनडे से वही घड़े की तरह काम करने वाला सप्ताह स्टार्ट हो गया हालाँकि में गधे की तरह तो काम नहीं करता पर और खुद को गधा कह कर पूरे गधे समाज से बैर भी लेना नहीं चाहता । मेरे पापा जिन्हें हम अर्थात सभी भाई बहिन और साथ में मम्मी दद्दू कह कर बुलाते है कहते थे की बोलने से पहले १०० बार सोचना चाहिए एक बार की चूक आपको भारी नुक्सान दे सकता है । इसीलिए ये गधा समाज उपर जो लिखा उसे मेरी भूल समझ कर भूल जाने का प्रयास करिये ये मैं सिर्फ लिखने मात्र ले लिए कर रहा हूँ । सोमवार को वही सुबह सुबह ऑफिस की भागदौड में एक सप्ताह और बीताने के लिए सुबह सुबह घर से निकल चुका था । स्टैंड पर आ कर देखा की आज का तो नज़ारा ही बदला हुआ है आज जाते वक्त स्टैंड पर इतनी भीड़ । फिर वही पुरानी बात याद आ गयी की आज तो सोमवार है । में एक निश्चित बस से ऑफिस जाता हूँ और अनिश्चित बस से वापस आता हूँ । कारण ये है की ऑफिस जाते वक्त उस निश्चित बस में सीट मिल जाती है और कुछ और निश्चित सवारियां बैठती है । बाकी सब सुविधानुसार होता है । उस बस के अधिकतर लोंगो का चेहरा पहचाना हुआ है अब अगर कोई नहीं आता है तो पता चल जाता है फलां सीट का सवारी आ गायब है । सबकी सीट लगभग निर्धारित है । मैं सबको अक्सर एक सीट पर बैठते देखता हूँ जिसके कारण मेरी भी एक सीट पक्की हो गयी है । सोमवार का पूरा दिन बड़े ही सुकून के साथ गुजरा अब शाम हो चुकी थी और ऑफिस से जाने का वक्त होने लगा । पर शायद मुझे आज भी किसी का इंतज़ार था । और मेरी नाक बार बार फडक रही थी । पर वो कहावत है न की बिल्ली के भाग्य  से रोज रोज छीका नहीं टूटता । इंतज़ार इंतज़ार ही रहा और मैं घर की तरफ रवाना हो गया । बस स्टैंड पर आज फिर पुराने लॉन्ग नज़र आने लगे थे । वही जाने पहचाने  चेहरे मुझे स्टैंड पर नज़र आने लगे थे । बस आई और में बस चढ गया । टिकट ले कर एक कोने में खड़ा हो गया । आज मन कुछ उदास था पता नहीं क्यों । पर उसका एक फायदा मिला । आज सब कुछ अपने आप हो रहा था । ५ मिनट के अंदर ही सीट भी मिल गयी । बिना किसी मेंहनत के पर वो न दिखी जिससे देखना था । उस दिन तो नहीं पर आज लिखते वक्त वक्त एक लाइन याद आइ है किसने लिखा है ये तो याद नहीं पर हम पर लाइन बिलकुल सटीक बैठती है । तृषणा तू न गयी मेरे मन से । इन्ही यांदों में खोता हुआ में अपनी सीट पर बैठा हुआ कुछ कुछ खोया हुआ अपने खयालो में सोता हुआ किसी की यादों को सहेजता हुआ बिना बात के हसता हुआ बस से उतर गया ।  

Monday, April 12, 2010

विदेशी मेहमान और ऑफिस का गरम माहौल



दिन शनिवार समय ८ बजे और मैं अपने ऑफिस में । सोच रहा था की अब निकालु की तब निकलु । पता नहीं क्यों आज ऑफिस से जाने का मन नहीं कर रह है । मन कर रहा है की ऑफिस में कम से कम २ घंटे और रूक जाऊ और थोडा काम और कर लु । पर मेरे बॉस ने तभी मुझे जाने का हुक्म सुना दिया । कारण ये है की ऑफिस का माहौल आज थोडा थोडा गरम हो गया था । इसका मतलब ये नहीं ही ऑफिस में लाइट नहीं आ रही थी । दरसल मेरे ऑफिस में कोई बला ( बाला अर्थात महिला) नहीं है तो पूरे ऑफिस में दिनभर भर पूरी तरह वो सम्पूर्ण पुरूष वाला (मतलब आप समझ ही गए होंगे) माहौल रहता है । कोई कंही से भी उठता है और कंही भी गिर जाता है । किसी की भाषा पर अब कोई कण्ट्रोल नहीं है । जो मन में आये वो कहो । तो हर किसी को ये माहौल बड़ा पसंद आता है । और कोई चाहता भी नहीं की उसकी इस आजादी को कोई आ कर छीने । पर उस दिन कोई आ चुकी थी जो की दोपहर से हमारे ऑफिस में विदमान थी और बड़े ही हर्षोल्लास के साथ हमारे साथ बातें कर रही थी और हम लॉन्ग थोडा थोडा समय निकल कर अपना अपना काम कर करे थे । अब आप सोचेंगे की उस महिला या स्त्री में एषा क्या था तो जनाब आपको मैं बता दू की वो महिला हम पर सालों शासन करने वाले अंग्रेजो के देश इग्लैंड से आई हुई थी । और मैंने किसी विदेशी महिला से शायद पहली बार आमने सामने बैठ कर बात की हो । और वो भी हिंदी भाषा में । वो जब तक ऑफिस में रही ऑफिस का माहौल ही दूसरा था । सब कोई आराम आराम से बात कर रहा था । बड़े ही नजाकत से हम एक दूसरे के साथ पेश आ रहे थे हालाँकि हम और दिनों में ऑफिस में कोई लड़ाई नहीं करते पर उस दिन का महौल कुछ और था । यही कारण था की मेरा मन ऑफिस में थोड़ी देर और रुकने का था । पर मेरे बॉस के कारण ऐसा संभव नहीं हुआ । खैर अब में कर भी क्या सकता था मरता क्या न करता मैं भी घर जाने को तैयार हुआ और वो गुड नाइट का स्वरनाद अभी भी मेरे मस्तिष्क में गोल गोल घूम रहा है । और मैंने जो कहा वो पता नहीं उसको याद था भी या नहीं । पर वो कहते है न कि सावन के अंधे को सब हरा ही हरा दिखाई देता है मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । ऑफिस से निकलते वक्त सब कुछ बड़ा अच्छा वाला फील हो रहा था । मुझे उस दिन किसी बात कि उतनी चिंता नहीं थी । बार बार ऑफिस कि दुर्घटनाये फ्लेशबेक हो रही थी । और कई गाने मुझे स्वतः ही याद आ रहे थे । इसका कारन क्या था मुझे अभी तक पता नहीं चला । आज घर जाना सबसे बड़ा काम लग रहा था । और घरवालों पे गुस्सा कि घर को ऑफिस से इतना दूर क्यों बनाया । पर में ये बात लिखने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकता था । क्योंकि उस दिन तो मन मेरा डोलिंग डोलिंग कर रहा था । वैसे किसी शायर ने ठीक ही कहा होगा जब किसी से पहली बार मिला होगा । आज स्टैंड पर किसी को देखने का मन नहीं था । और उस दिन बस भी जाते ही आ गयी । बस में सवारी उतनी नहीं थी जितनी होती थी आम दिनों । मैंने एक कोने में अपनी जगह बना ली । और ख्यालों में खोने लगा । उस दिन का मर्म और उस पर गर्म दोनों ही अपना कमाल दिखा रही थी । पता नहीं किस किस तरह मनमोहक खुशबु मेरे नाकों में आ आ कर जा रही थी । और मुझे पुनः ख्यालों में खोने को मजबूर कर रही थी । उस दिन बस में कौन क्या क्या कर रहा था मैंने कुछ भी नोट नहीं किया बस अपने में ही खोट नज़र आ रहा था । कि अचानक देखा मेरे सामने सीट खाली हुई और मैंने बिना चुके चौका मर दिया और अपने सभी साजो-सामान के साथ उस पर विराजमान हो गया और पुनः ख्यालों में खो गया । गनीमत ये रही कि मेरे स्टैंड आने से पहले मेरे एक मित्र का फोन आ गया वरना पता नहीं मैं अपने स्टैंड उतरता या दूसरे के ।   

Saturday, April 10, 2010

बस में चोरी और आदमी का साहस

मैं आज कल अपने अपने पुराने ढर्रे पर आ गया हूँ । रोज ऑफिस से लेट घर जाना एक तरह की आदत हो गयी है । और अगर थोडा पहले जाता हू तो थोडा सा अच्छा भी नहीं लगता है । और इसके पीछे एक कारण  और भी है वो है बस का ना मिलना । तो ऑफिस में ही मीटर डाउन किये रहता हूँ ।  इससे दो फायदे होते है एक तो लोगो को लगता है की मैं वर्कअल्कोहलिक हूँ और दूसरा ऑफिस से उस टाइम निकलता हूँ  की बाहर जाऊ और स्टैंड पर खड़ा हूँ और बस के अंदर । ये तो वही हुआ एक तीर से दो शिकार । कल भी कुछ ऐसा ही किया और  बड़ा अच्छा भी लगा । मेरे सीनियर ने मजाक मजाक में कह भी दिया की बेटा ज्यादा काम न किया कर लोंगो पर दुष्प्रभाव भी पड़ता है । ये बड़ी ही छूत की बीमारी है और ऑफिस में बड़ी जल्दी फैलती है । ये रेडीयेशन से भी तेज असर करती  है । मैंने सोचा की ये बात बता रहे है या डरा रहे है पर जो भी हो मुझे लगा सिखा सहे है । तो मैंने रेंचो जी की भाँती उस ज्ञान को भी अर्जित करने की कोशिश की और सफल भी हो ही गया । खैर बस में आज कुछ ज्यादा भीढ़ नहीं लगी । मुझे कारण तो बताना है कारण ये है की एक बस जा चुकी है । और भीढ़ के कारण मैं चढ नहीं पाया । और बाकी लोंगो तो  चढ गए और  बस स्टैंड अपने आप खाली हो गए । तो मैंने भी दूसरे बस का इंतज़ार करने  लगा पर इंतज़ार इंतज़ार नहीं कर पाया और एक के जाते ही दूसरी बस आ गयी । मैं बड़ी ही शराफत के साथ बस में चढा । पर आज होनी को कुछ और लिखा । किसी ने बस में किसी का पर्स मार लिया अब तो वो दहाड़ मार मार कर रोने लगा । रोना स्वाभाविक था क्योंकि शायद उसमे उसके काफी रूपय थे और अगर आपकी जेब मैं कभी भुले भटके 5 का नोट भी मिल  जाये तो 500 के नोट के बराबर खुशी देता है उसी तरह कभी 5 रूप गिर जाये तो वो 500 की याद दिला देता है । और उस बेचारे को तो लगभग 1000 का नुक्सान हुआ था पर उसने हिम्मत नहीं हारी । उसे एक नहीं 2 लोंगो पर शक हुआ था उसने तुरंत 100 नंबर पर फोन किया और 5 मिनट में बस के सामने 2 हट्टे कट्टे पुलिस के जवान मोटरसाइकिल लिए खड़े थे । अब तो एक साथ चेक्किंग का दौर शुरू हुआ तो लगभग १ घंटे बाद जा कर एक अच्छा सा दिखने वाला आदमी पकड़ा गया । साथ में उसका पर्से भी मिल गया । उस आदमी के चेहरे पर बड़ा संतोष था और दूसरों के चेहरों पर असंतोष क्योंकि उस अमनी की वजह से उनको १ घंटे की देर हो गयी । सब यही सोच रह थे की अब तक घर पहूँच जाता या अभी टीवी पर आईपीएल मैच देख रहा होता । सच कहू तो एक दो बार मेरे मन मैं भी ये ख्याल आया । पर जब उस आदमी की बदहवास हालत देखता तो वो ख्याल मन में ही खा जाता । उसके बाद जो बस चली फिर तो बस में एक ही बात थी पर्से और वो आदमी । अब हर कोई यही कह रहा था को बड़ा अच्छा काम किया तुमने ऐसा ही करना चाहिए । इत्यादि इत्यादि और वो आदमी अभी भी  अपने आंसु पोछ रहा था तो कभी अपना पर्से  देख रहा था । पर उसके चेहरे पर जो संतोष था वो सबसे तेज था ।