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Monday, December 19, 2011

मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम


मुझे याद नहीं मैंने फ़िल्में देखना कब शुरू किया, हाँ इतना जरुर याद है की देखी बहुत सी फ़िल्में हैं. पहले आज की तरह 24 घंटे का चैनल नहीं हुआ करते थे.एक मात्र देखने का जरिया दूरदर्शन हुआ करता था. जोकि हफ्ते में 2 बार फिल्मे देता था शनिवार और रविवार. पर हम लोगों के पास एक और भी जरिया था वो था वीडियो. जो अकसर हम किराये पर लाते थे. जिस समय किराये पर वीडियो लाने का चलन था उस समय वीडियो वाले की बड़ी चाँदी हुआ करती थी. वीडियो देने से पहले वो 4-5 हितायतें देता साथ ही वीडियो कैसट ना छूने की सलाह देता. हम सब कुछ हाँ में कहते और ले कर चले आते.

उस समय 3-4 स्टार अपने टॉप पर थे. मिथुन, गोविंदा, अमिताभ और जितेंदर उनमे से कुछ नाम है. हम पूरी रात के लिए विडियो किराये पर लेते थे. वैसे मेरा मोहल्ला था तो बहुत बड़ा पर हमारी बोलचाल कम से थी, और उतना ही कम आने-जाना व्यव्हार. सिर्फ कुछ ही परिवार थे जिनके घर आना जाना होता था. तो जब घर में वीडियो लाया जाता तो उनको बुला लिया जाता और घर में एक छोटी-मोटी पार्टी का माहौल होता. चूँकि हम छोटे थे तो बड़ा मजा आता की घर पर खूब सारे लोग है. उपर से पढ़ने का कोई इरादा नहीं तो खुशी से खुशी दुगनी हो जाती थी. इन सब के बीच जो सबसे बड़ी समस्या होती कि कौन-कौन सी फिल्मे आनी है. उस समय जो चल रही होती वो तो आती ही, फिर होती दूसरी और तीसरी फिल्म कौन सी होगी. यह समस्या उस रात से 2-3 दिन पहले तक होती. अच्छा हम लोग हल्ला भी ज्यादा नहीं कर सकते थे क्योंकि डर भी लगता कहीं घरवाले भी ना डांटे और वीडियो लाने का प्रोग्राम ही रद्द ना कर दें. तो सारा काम बड़े ही चतुराई से करना होता था. आखिर में सब मिला जुला कर 2 नई फिल्मे और एक थोड़ी पुरानी फिल्म लाने का फैसला होता. बड़ों का भी ख्याल रखना पड़ता था.

फ़िल्में खाने-पीने के बाद लगभग 9 बजे शुरू होती. उस दिन खाना भी फिल्म के चक्कर में जल्दी हो जाता. हम सभी को खाने पीने में मन नहीं लगता क्योंकि अंदर से खुशी तो फ़िल्में देखने की होती और खाना पेट में जाता ही नहीं. घरवाले जैसे-तैसे करके खाना खिलवाते और फिर टीवी के आगे मंडली जम जाती. वीडियो वाला भी रात में हम ही लोगों के साथ टीवी  देखता क्योंकि उसे लगता की कहीं कोई गडबड हो गयी तो क्या होगा. इसलिए वो अपने एक जूनियर को भेजता. ना जाने कितनी तार लगाने के बाद तो VCR चलता. उसके तार लगाने के साथ ही हम सब कैसट चेक करते-करते वीडियो वाले की तरफ देखते कहीं वो देख तो नहीं रहा.

फिर वीडियो शुरू हो जाता. मुझे याद है हर वीडियो चलने के पहले एक अजीब से धुंधली लाइन आती. कुछ दिनों बाद हमे भी पता चल चलने लगा कि वीडियो अच्छा है या बुरा. मेरा मतलब प्रिंट से था, और हम पहले से बोलने लगते भईया ये कैसट खराब है बदल कर लाओ. जब भी ऐसा होता तो वीडियो वाला पता नहीं VCR के किस-किस हिस्से में फूँक मरता और वीडियो सही  चलने लगता. हमें वो वीडियो वाला उस दिन बड़ा चमत्कारी लगता और सोचते की बड़े होकर में भी वीडियो वाला ही बनूँगा. पर अगले ही पल ये सारे विचार रद्द कर के फिल्म देखने में लग जाता. मुझे फिल्मों में हीरो के साथ-साथ विलेन भी बड़े अच्छे लगते. खैर पहले जब छोटा था तो सब बराबर ही लगते पर जैसे-जैसे बड़ा हुआ तो लगता की विलेन अगर विलेन नहीं होता तो किसी हीरो से कम नहीं होता. क्योंकि हर परेशानी हीरो को ही होती है खलनायक मजे करता है. सुर, सुरा और हीरोईन से कहीं से भी कम न दिखने वाली वैम्प जो उसके साथ रहती. इतना ही नहीं वो लड़की(वैम्प) उसके लिए किसी स्तर तक जाने को तैयार रहती. वहीँ हीरो को पता नहीं क्या क्या करना पड़ता था. गाना गाने से लेकर, नौकरी करना, धक्के खाना, उसके पापा से शादी की बात करना इत्यादि. मैं कभी कभी सोचता की यार हीरो से अच्छा तो विलेन ही होता है. उसे सब कुछ पहले से मिला होता है. और वो हीरो से ज्यादा पॉवरफुल होता है. मुझे भारतीय फिल्म इतिहास के विलेन में कुछ बहुत ही खास और अच्छे लगते हैं/थे. एक तो सदाबहार अमरीशपुरी, फिर उनके छोटे भाई मदनपुरी. मुझे मदनपुरी की बन्दूक पकड़ने की अदा बड़ी अच्छी लगती थी. साथ एक और थे जो बन्दूक बड़ी अदा से पकड़ते थे वो थे K.N Singh. मुझे याद है संजय दत्त की एक फिल्म थी सड़क. जिसे में 1 हफ्ते में कोई 10 बार देखी होगी कारण सिर्फ सदाशिव अमरापुरकर थे. क्या एक्टिंग करी थी उन्होंने उस फिल्म में. मुझे आज भी विलेन हीरो से अच्छे हो लगते है. पुराने फिल्मों में एक बड़ी अजीब आवाज़ आती जब हीरो और विलेन के बीच लड़ाई होती वो होती थी मुंह से निकलने वाली आवाज़ ढिशुम-ढिशुम. ये बात मुझे मेरे पिता जी ने बताई क्योंकि मुझे लगता था की यह आवाज़ सच में निकलती है जब किसी दो लोगों के बीच हाथापाई होती है तो. आज उन आवाज़ हो किसी फिल्मों में सुनता हूँ तो हँसी सिर्फ चेहरे पर नहीं दिल में भी होती है.

कुछ ऐसा ही मंजर मुझे मेट्रो में देखने को मिला. मैं अपनी सीट पर बैठा किताब पढ़ रहा था तभी मुझसे अगले गेट के पास से 2 लोगों के झगडे की आवाज़ आयी. दोनों सीट को लेकर झगडा कर रहे थे. हुआ ये था की एक जनाब बैठे थे और एक जनाब खड़े थे. जो जनाब खड़े थे उनको बार–बार पैर लग रहा था. कैसे ये नहीं पता. बस उसी बात पर झगडा हो रहा था. तभी इन दोनों के बीच एक जनाब बीच-बचाव करने के लिए कूद पड़े. जो जनाब खड़े थे अब वो बैठे वाले को छोड़ कर बीच-बचाव करने वाले पर ही उल्टा सवार हो गए. दोनों की बातों में जमीन आसमान का अंतर था क्योंकि जो खड़ा हुआ आदमी था वो ऑक्सफोर्ड का पढ़ा हुआ लगता था और दूसरा हरियाणा के एक सरकारी स्कूल वाला. कुछ देर तक वैसे ही बकझक होती रही. और अचानक सन्नाटा छा गया. ये तूफ़ान के पहले की ख़ामोशी थी. फिर अचानक इस सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज़ आयी. ढिशुम-ढिशुम. हर कोई उधर ही देखने में लग गया. हरयाणवी ने अपना जलवा दिखा दिया और ऑक्सफोर्ड वाले को मेट्रो में तारे दिखा दिए. मुझे भी ऐसी उम्मीद नहीं थी. पर ऐसा हो गया. उसके अगले स्टेशन पर ऑक्सफोर्ड और हरियाणा वाले मेट्रो के नीचे थे.

Tuesday, November 8, 2011

पहचान कौन ?


अक्सर रात में जब ऑफिस से लेट घर जाता हूँ तो घर पहुच कर बड़ा अजीब लगता है. क्योंकि मेरी माता श्री को छोड़ कर सब सो चुके होते हैं. आपके पास किसी से बात करने का समय नहीं होता. सबसे बड़ी बात होती है कि कभी-कभी मेरा भतीजा जिसे रात में सुलाने के लिए नाकों चने चबाना पड़ते हैं, वो भी मेरा इंतज़ार करता है. और अपनी तोतली आवाज़ में पूछता है ओफिज से आए हो. खाना नहीं खाओगे. मेरे मना करने पर थोड़ी देर मेरे साथ बात करते-करते धीरे-धीरे सो जाता है. फिर मैं अपनी सालों पुरानी पर अब तक ना पड़ने वाली आदत से मजबूर टीवी देखने लगता हूँ. मुझे रात में टीवी देखना थोड़ा ज्यादा पसंद है. क्योंकि आप बिना किसी रोक टोक के चैनल बदल-बदल कर देख सकते हैं.  पर रात में एक समस्या भी होती है वो है जब आप चैनल बदलते हैं तो कमरा लाइट से भर जाता है और फिर नए चैनल से फिर अँधेरा हो जाता है. रात में अंग्रेजी-हिंदी फिल्मों के साथ-साथ एक सबसे अच्छी चीज़ आती है वो है टेली शॉपिंग नेटवर्क. यह आपको दुनिया की नायाब से नायाब चीजें सबसे सस्ती और टिकाऊ तरह से बेचते हैं फिर वो चाहे सोफा हो या नज़र यन्त्र या फिर चवनप्राश का दादा पॉवरप्राश.  इसके साथ एक और चीज़ आती है जो मुझे सबसे अच्छी लगती है उसका नाम है पहचान कौन? ये नाम मैंने दिया है. कारण है इसमें २ चेहरों को एक साथ मिला दिया जाता है और फिर पब्लिक से पूछा जाता है अगर आप दोनों चेहरों को पहचान चुके हैं तो अभी कॉल करिये, आप जीत सकते हैं 50000 तक ईनाम.अभी कॉल करिये.

इसमे कई बार क्या, हर बार इतने आसान और बड़े-बड़े लोगों या फिल्म स्टार के चेहरे लगाए जाते हैं कि अंधा भी पहचान ले. पर मजाल है पब्लिक का कोई बन्दा उन्हें पहचान पाए. अगर सलमान और शाहरुख खान की पिक्चर है तो लोग फोन करके कहते हैं कि आमिर खान या संजय दत्त. तब एंकर उनको बड़े प्यार से कहतें है आप बहुत करीब पहुच गए थे पर अफ़सोस ये गलत जवाब है. जल्दी से फोन करिये. फिर अगला कॉल आता है वो कहेगा अमिताभ बच्चन. फिर क्या! सुनते ही हँसी निकल जाती है. जब आप उनको कॉल करते हैं तो 10 रू प्रति मिनट का खर्चा आता है. ये बात शायद मेरे एक पड़ोसी की पत्नी को नहीं पता थी. उसको लगा कि इतना आसान सा सवाल है अगर वो बता दे तो 50000 उसके हो जायेंगे यही सोच कर उसने कॉल कर दिया. इसके बाद तो जैसे अजगर अपने शिकार को फंसाता है वैसे ही कंपनी ग्राहक को उसमे फसाती चली जाती है. और ग्राहक को पता ही नहीं चलता कि वो 10 रु प्रति मिनट से अपनी भी पैर पर कुल्हाड़ी चला रहा है. और उसे कुछ नहीं मिल रहा है. क्योंकि फोन पर वो सिर्फ अपना नाम, पता और पता नहीं क्या क्या नोट करा रहा होता है जो कि कछुआ चाल से होता है.

कुछ देर बाद पता चलता है किसी ने एक एक्टर का नाम सही-सही बता दिया पर दूसरा नहीं बता पा रहा है. फिर क्या ईनाम कि राशि बढ़ जाती है. उधर कॉल करने वाली कि धड़कन बढ़ जाती है कि ईनाम उसको मिलेगा या नहीं. आखिर में ना जाने कितने मिनट कि जद्दोजहद के बाद उसे पता चलता है कि उसे लूट लिया गया.

खैर ये तो था मेरा अनुभव, सच मानिए उस प्रोग्राम देखते वक्त में सबसे ज्यादा हँसता हूँ. ये पहचानने का खेल कभी-कभी मेट्रो में भी होता है. जब आप रोज मेट्रो में सफर करते हैं, तो आपको कुछ चेहरे हर रोज दिखाई देते हैं. और जब आप अलग-अलग समय पर यात्रा करते हैं तो आपको सारे चेहरे एक जैसे लगते हैं. और कभी-कभी लगता है इसको कहीं देखा है. वैसे मेरे साथ एक दो बार ऐसा हुआ कि मुझे मेरे साथ मेट्रो में चलने वाले मार्केट में दिखाई दिए, मैं सर पकड़ कर बैठ गया कि इसको किधर देखा है, किधर? दिमाग में सारे तीर चलाने के बाद पता चलता है, अरे ये तो मेट्रो में दिखा था. फिर क्या, लग जाता हूँ अपनी शॉपिंग करने में यही सोच कर कि अब कोई नया चेहरा दिखे, जो मुझे याद ना हो. 

Tuesday, November 1, 2011

रघु, राम और रोडीज


रविवार की रात का कोई 12 बजा होगा, आखों से नींद कोसों दूर थी और लगता भी नहीं की जल्दी नींद आने वाली थी, क्योंकि कल मेरी मुलाकात उन लोगों से होनी थी जो आज देश में अपना एक मुकाम रखते हैं. पिछले कुछ सालों से उन्हें लगातार टीवी पर देख रहा हूँ, यदा-कदा टिप्पणी भी
करता था पर अपने दिल में ही रखता या फिर सिर्फ करीब के मित्रों से ही बात करता. उनकी कहानी भी कोई १० साल पुरानी है. जीरो से हीरो का सफर हमेशा कितना सुखद होता है. ये शायद उनसे बेहतर कोई नहीं जानता. उनके विकराल कठोर चेहरों ने कार्यक्रम (प्रोग्राम) को एक नया रूप दिया. और उन्हें एक नए ही रूप में पेश किया. उन्होंने एक साधारण से प्रोग्राम को एक नए आयाम पर पंहुचा दिया. मैं वक्त से पहले ही जाग गया. ऐसा मेरे साथ अकसर नहीं होता था. सारे काम निपटा कर मैं audition  वाली जगह पर करीब 10 बजे पंहुचा तो कम से कम 5 हजार से ज्यादा लड़के और लड़कियां लाइन लगाए हुए गेट के बाहर खड़े थे. उनमे जोश कूट-कूट कर भरा हुआ था. कोई भी हटने का नाम नहीं ले रहा था. धूप भी उनकी परीक्षा लेने में लगा हुआ और उनके इस इम्तिहान को और कठिन बना रहा था पर सारे भावी रोडीज डटे हुए थे अपनी राहों में. उन्हें ना धूप कि परवाह थी ना पानी की, उन्हें तो सिर्फ परवाह थी रोडीज की. मैन गेट के बाद जब हम अंदर पंहुचे तो बाहर से ज्यादा भीड़ अंदर थी. बैरीकेडिंग उनको रोकने के बनी थी जो उन्हें रोक पाने में बेकार थी. स्टेज पर तरह-तरह के Engaging प्रोग्राम चल रहे थे. उसके बाद उनको उपहार बाँटें जा रहे थे. कुछ लोग दीवार से चिपक कर प्रैक्टिस कर रहे थे कि ग्रुप डिस्कशन में कैसे बोलना होगा, बॉडीलाइन कैसे रहेगी इत्यादि.

Pradip
मैंने भी मौका देख कर कुछ उम्मीदवारों से सवाल पूछने शुरू कर दिए.
मैंने प्रदीप से पूछा की इधर क्यों आये ?
तो वही पुराना सालों से चलने वाला जवाब, मुझे कुछ कर दिखाना है अपनी लाइफ में.
फिर मैंने पूछा की प्रदीप तुम पढ़ लिख कर भी कुछ कर सकते हो फिर रोडीज ही क्यों?
तो वो बोला बस ऐसे ही एक बार टीवी पर आ गया तो लाइफ सेट. टीवी पर के बाद फेम कितनी तेज़ी से मिलता है ये सबको पता है, उतना पढ़ने से नहीं मिलता.










सबसे ज्यादा भीड़ 18 से 26 के युवाओं की थी. ऑडिशन में हर कोई अपने तरीके से तैयारी कर रहा था, कोई उठक-बैठक लगा कर जिम के पैसों को साबित करने में तुला हुआ था तो कोई चुटकुले सुना कर माहौल को शांत और अपने आपको पक्का टाइम पास बताने में. 











क्रू मेम्बर का काम मुझे सबसे ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि जहां वो एक तरफ उम्मीदवारों से सख्त थे. वहीँ वो ये भी चाहते थे की कोई बिना ऑडिशन दिए ना जाए. बस उसकी उम्र 18 से कम ना हो. क्रू मेम्बर में प्रोडक्शन और कैमरा यूनिट थी. जिनमे कुछ उपर से नारियल बनने का प्रयास कर रहे थे पर उनको देख कर लगता था की वो अंदर से भी नारियल ही थे. मुझे रोडीज़ क्रू की एक बात सबसे अच्छी लगी की उनको इस बात का बिलकुल भी घमंड नहीं था, वो उतने ही शांत और निर्मल थे जितनी की गहरी नदी होती है. देखने वालों को इसका एहसास ही नहीं होता की वो अंदर कितनी गहरी है. सब से सब अपना तन और मन लगा कर सारे प्रयास कर रहे थे फिर वो चाहे काम बड़ा हो या छोटा.
Roadies crew managing lines 

Activity 

Audition line




ऑडिशन के बाद GD(ग्रुप डिस्कशन) था. इसमें रोडीज की ओर से एक मेंटोर रखा गया था. जो हर प्रतिभागी की योग्यता का आकलन करते थे. ये भी कुछ कम रोचक काम नहीं था क्योंकि मेंटोर को कुछ ही सेकेंड में प्रतिभागी की क्षमता का आकलन करना होता है जोकि छोटा काम नहीं है. आपके पास सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी जिसे आपको पूरी शिद्द्त के साथ पूरा करना होता है और इसी पर पूरे शो का दामदार होता है.अभी ग्रुप डिस्कशन में थोड़ा समय था, शायद मेंटोर थोड़ा थक गयी थी. तो मैंने भी सोचा तब तक क्रू मेम्बर का ही पोस्टमॉर्टम किया जाए.
फिर मैंने रोडीज से पिछले ४ साल से जुड़े एक कैमरामैन से बात करना शुरू किया . सबसे पहले तो में उनको अपना परिचय दिया, तो जनाब बड़े ही मजाकिया अंदाज़ में बोले यार पहले आराम से बैठ तो जाओ और पारले जी का पैकेट मेरे ओर बढा दिया. मैंने भी बड़ी ही नजाकत से उनका नाम पूछा और भी शुरू कर दिए सवालों के बाण. मुझे लगा की यही वो मौका है जिस पर में चौका मार सकता हूँ.   
आप कब से रोडीज के साथ है ?
करीब ४ साल से.
कैसा रहा अब तक अनुभव?
अब तक तो अच्छा है ?
अब तक का सबसे अच्छा अनुभव?
रोडीज के साथ काम करिये, आपका हर पल मजेदार और रोचक होगा. यहां एक तरह का संसार है जिसे हम रोडीज कहते हैं और सब उसी के हिस्से और सदस्य है. हम हँसते हैं, झगड़ते हैं, अपने सुख-दुःख बाटते हैं बिलकुल एक परिवार की तरह.
कभी लगा की रोडीज ज्वाइन करके गलत किया क्योंकि काम का कोई वक्त नहीं होता है?
नहीं. शुरू से ही मुझे खुद कोई भी काम करने का टाइम नहीं था बस वही आदत इधर भी है. कभी कभी तो चीजे इतनी तेज़ी से बदलती है की पूछिए मत.
फिर जब मैंने उनकी फोटो के लिए कहा तो जनाब शरमाते हुए बोले अरे नहीं यार फोटो मत लो. फिर भी मैंने ले ही ली फोटो.
Roadies Cameraman 
उसके बाद हम ग्रुप डिस्कशन शुरू हुआ करीब २० लोगों की उसमे बुलाया गया था. उनको लाइन से बैठा दिया गया. फिर शुरू किया गया उनके नज़रिए का आकलन. टॉपिक था क्या स्कूलों में कंडोम मशीन लगानी चाहिए या नहीं. मेंटोर ने जैसे ही टॉपिक बताया कि सारे के सारे लड़के ऐसे टूट पड़े कि मानो भूखे शेर के आगे गोश्त का टुकड़ा रख दिया गया हो. फिर मेंटोर ने सबको समझाया और सबको बोलने के लिए करीब ३० सेकंड दिए. उनको उन्ही ३० सेकंड में बोलना था. कुछ ने थोड़ा समय लिया किसी ने १० सेकंड में ही बता दिया कि उनकी क्या सोच है. तो किसी ने ३० से भी ज्यादा का समय लिया पर अपनी सोच को एक दिशा नहीं दे पाए. खैर हमने हर एक को सुना और देखा. किसी की सोच पर हँसी भी आयी, तो किसी कि सोच पर दया.




उसके बाद हमें बताया गया कि अगर हम सभी ने अपने-अपने हिस्से का काम कर लिया गया हो तो हम रघु और राजीव से अब मिल सकते हैं. मैं बहुत देर से इसी का इंतज़ार कर रहा था. फिर तो मानो मेरे शरीर में फुर्ती आ गयी. हम सब रघु और राजीव से मिलने के लिए आतुर थे.
इसके बाद हमें एक कमरे में ले जाया गया जहां राजीव पहले से बैठे हुए थे. उन्होंने हमारा स्वागत उठ कर किया. और बड़े आदर से एक शिष्ट आगंतुक कि तरह बैठने को कहा. हम अभी बैठना के लिए सीट ढूंढ ही रहे थे कि पीछे से रघु भी आ गए. राजीव और रघु के चेहरे में कुछ खास अन्तर नहीं है पर अगर आप गौर से देखेंगे तो आपको पता चल जायेगा कि कौन रघु है और कौन राजीव? मैंने एक बात और गौर की, राजीव के  चेहरे में एक चुलबुलाहट झलकती है जबकि रघु का चेहरा उपर से सख्त, गम्भीर स्वाभाव होने के साथ थोड़ा बहुत ही दया रहित मालूम होता था. यही वो सब चीजे है थी जो मैंने सबसे पहले गौर करी. फिर उन दोनों के साथ हम सभी लोग बैठ गए. एक राउंड टेबल के चारो तरफ. फिर एक दूसरे से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. पहले रघु और राजीव ने हम सभी का अभिनन्दन किया. फिर सारी बातचीत एक इंटरव्यू में बदल गयी.
सब एक से बढ़ कर के सवाल पूछ रहे थे.
Raghu & Rajiv @Photo@Christine 
मैंने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए सवाल पूछ ही लिया. मैंने पूछा की क्या अपने सोचा था कि रोडीज इतना हिट होगा या इसको इतना जबरदस्त रेस्पोंस मिलेगा.
राजीव( हँसते हुए)- हाँ... फिर नहीं हमने नहीं सोचा था.
उसके बाद एक सवाल, फिर एक सवाल और कई जवाब. ऐसा करीब १३ मिनट तक चला. मुझे लग रहा था कि रघु और राजीव को मैं बरसों से जानता हूँ. क्योंकि वो जीतने क्रूर और दानव टीवी पर थे यहां उतने ही विनम्र और शालीनता से बातों का जवाब दे रहे थे. किसी उनकी इसी बात पर चुटकी भी लेनी चाही पर उन्होंने कुछ ऐसा किया और कहा कि १० सेकंड के लिए माहौल में सन्नाटा छा गया.


पर जो भी कहिये इंटरव्यू हुआ बड़ा धासु. मैं राजीव के बिलकुल बगल में और रघु के ठीक सामने बैठा था. और अपना कैमरा लगातार ऑन किये हुए था. इसी बीच एक भूतपूर्व रोडीज़ की एंट्री हुई. फिर उन्होंने भी अपने तजुर्बे और आज के दिन का आखों देखा हाल हमें बताया.
अब हमारे जाने का समय हुआ तो उसी के साथ मेरे दिमाग में कुछ सवाल मेरे दिमाग में गूंजे. में जाते जाते अपना कैमरा ऑन रखा और सवाल पूछता रहा. रघु ने भी बड़े ही इत्मीनान से उनका जवाब दिया.
जाते जाते उनके साथ बिताये पल बहुत ही अच्छे थे.
मेरे रोडीज़ का सफर दिल्ली में तो शानदार रहा. कुछ रोडीज़ के दीवानों से मुलाकात और रोडीज़ के पीछे काम करने वाले. फेम से अंजान दीवानों तक सबसे मुलाकात शानदार रही. रघु और राजीव के तो क्या कहने. वो सिर्फ टीवी पर ही इतने सख्त और दयारहित दिखते हैं असलियत में वो बिलकुल इसके विपरीत हैं.
रोडीज़ की सफलता की कामना के साथ मैंने भी रोडीज़ के सेट से फिर कभी, कहीं और मिलने का वादा करके अलविदा कहा.


Tuesday, August 23, 2011

बरसात की वो रात...


11अगस्त की बात है शाम के करीब 7 बजे होंगे. बादलों ने आज महीनो से सूखी धरती को सराबोर करने की ठान रखी थी. पानी इतनी तेज बरस रहा था, मानो आज ही सारा पानी गिर जायेगा. बूंदों की आवाज़ और सड़क पर पानी का बहाव दोनों ही अच्छे लग रहे थे. मेरा भी ऑफिस खत्म हो चुका था. घर जाने का इंतज़ार था, पर अब बारिश रुके तो चला जाए. पर पता नहीं क्यों, मेरा बारिश से एक अजीब सा रिश्ता है, उसकी पहली बूंद के साथ ही मेरे दिल में एक अजीब हलचल होने लगती है. और मेरा मन भीगने के लिए व्याकुल हो जाता है. मुझे याद है जब में छोटा था तो आप सभी की तरह कागज की कश्ती पानी में चलाता और उससे तेज मैं खुद भागता था. मेरे घर में एक बड़ा सा आँगन होता था जिसमे बारिश का पानी, टीन की चादरों से होता हुआ मेरे आँगन में आता था. कभी कही इतना पानी होता की आँगन में घुटनों से थोड़ा कम हो जाता था और मैं उसमे बड़ी मस्ती से खेला करता था. घंटों भीगता, पानी से खेलता और सब कुछ भूल जाता.
उम्र के साथ बहुत कुछ बदला पर बारिश में भीगना नहीं बदला. मैंने भी आज पानी में भीगने का मन बना लिया. वैसे भी दिल्ली में ऐसे मौके चूकने नहीं चहिये, बस फिर क्या था मैंने अपने ऑफिस के मित्र को जोर दिया और हम दोनों निकल पड़े बरसते पानी में भीगने के लिए. हमारे ऑफिस के आस-पास ऑटो और रिक्शे का आभाव है. हमें अक्सर मुख्य मार्ग तक पैदल ही जाना होता है जो करीब 300मीटर दूर है. मैं और मेरा मित्र, इस तेज बारिश में, सड़क पर तेज़ी से आती हुई लहरों को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे. वो मुझसे थोड़ा तेज चल रहा था तब मैंने उसे एक ज्ञान दिया कि विदेश के एक वैज्ञानिक ने रिसर्च किया और निष्कर्ष ये निकला कि चाहे आप भागे या आराम से चले दोनों ही परिस्थितियों आप एक समान ही गीले होंगे. पहले तो उसमे हैरानी जताई पर बाद में मान गया और मेरी तरह आराम से चलने लगा.

पर वो मेरी तरह गीले होने के पक्ष में नहीं था तो उसने जल्दी से एक ऑटो को आवाज़ दी और मुझे ले कर बैठ गया. मेरे सारे सपने जैसे पानी के साथ धुल गए. अब मैं क्या करता? मेरा और उसका रोज का साथ था, छोड़ कर जा भी नहीं सकता था. मैं भी मन मार कर बैठ गया. ऑटो वाले ने भी अचरज से देखा और अपनी गाड़ी कि रफ़्तार बढ़ा दी. अब तो सिर्फ छत पर पानी कि बूंदों के साथ सड़क पर गाड़ियों के चलने कि आवाज़ आ रही थी.

मेरे मित्र का स्टेशन पहले आता है, पर बात करते-करते समय कैसे कट जाता है पाता ही नहीं चलता. और मेट्रो एक एसी वाला पिंजरा है जिसमे आपको मजा तो आता है पर आप ज्यादा देर रहना पसंद नहीं करते. और मेरा तो वैसे भी आज मेट्रो से जाने का मन बिलकुल नहीं था. मैंने मेट्रो से उतर कर बस से जाने का फैसला किया. और राजीव चौक पर मेट्रो छोड़ दी. और बस से घर जाने के लिए निकल पड़ा. मुझे बस भी जल्दी मिल गयी और सीट भी. सड़क पर बरसात के कारण भीड़ ज्यादा थी.

पानी अपने पूरे जोर पर था. पानी कि बूंदों बस के शीशे से टकरा कर एक नई धुन बना रही थी. तभी मेरी नज़र पानी गिरते शीशे के पार गयी. एक लड़की बस के इंतज़ार में स्टॉप पर खड़ी थी. वो स्टैंड कोई बड़ा नहीं था. छत भी टपक रही थी. पानी कि बूंदे जैसे उस पर जानबूझ कर ज्यादा ही गिर रही थी. तेज हवा उसके दुप्पटे के साथ कुछ ज्यादा खेल रही थी बार-बार समुंद्र कि लहरों के तरह दुप्पटे को जोर से हिला रही थी. और वो उनसे बचने के लिए बार-बार उनको संभाल रही थी. पर उसके दूसरे हाथ में शायद कुछ था जो उसे उसका दुप्पटा नहीं संभलने दे रहा था. कभी वो पानी से बचने के लिए दुप्पटा के सर को ढकती और कभी हवा से गीला दुप्पटा उसके चेहरे पर आ जाता. जिस तरह ओस से गुलाब की पंखुरियों पर पानी की बूंदें जमा हो जाती है वैसे ही पानी की फुहारों से उसके गालों पर छोटी छोटी बूंदें थी जो हर बार दुप्पटे से साफ़ हो जाती और दुबारा आ जाती थी. उसका चेहरा बिलकुल बच्चों कि तरह था, बड़ी बड़ी ऑंखें, बिलकुल सलीके से सिला गया सूट. रंग मुझे याद नहीं पर उसमे वो बड़ी हसीन लग रही थी. ट्रैफिक भी स्लो था. मेरी और उसकी नज़र नहीं मिली. मैं भी शीशे पर बारिश से बनी ओस को रह-रह कर हटा कर उसे देखता कि उसे बस मिली या नहीं. सच पूछिए तो बस को कम उसे ज्यादा देख रह था. उसे कोई बस नहीं मिल रही थी और वो बरसात में ना चाहते हुए भीग रही थी. और मेरी बस धीरे-धीरे चल रही थी और मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था.

Friday, August 5, 2011

भरी मेट्रो में जेब खाली


मेट्रो में आजकल भीड़ ऐसे बढ़ रही है जैसे रेलवे स्टेशन में चूहे. हर कोई मेट्रो से ही जाने की जिद करता है. दिल्ली तो छोडिये बाहर का भी कोई दिल्ली आता है तो सबसे पहले मेट्रो का ही जिक्र करता है. मेट्रो है भी शानदार नए चमचमाते डिब्बे, एसी का आनंद, कम किराया और बस से जल्दी पंहुचाने की गारंटी. आप अगर एक बार दिन में मेट्रो मैं बैठ गए, फिर आप भी मेट्रो के दीवानों की लिस्ट में आ जायेंगे.

पर मेट्रो का असली हाल जानना हो तो, जो रोज सफर करते हैं उनसे जानिए. मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूँ जो दिल्ली के एक छोर से दूसरे छोर की यात्रा करते हैं. उन्हें मेट्रो से जाना पसंद है क्योंकि बिना पसीना बहाये वो अपने ऑफिस या घर पहुच जाते हैं. और अगर माने तो एक फायदा और भी है, अगर आप लेट हो गए तो सारा का सारा ठिकरा फोड़ दीजिए मेट्रो पर. सबसे पहले यह कि जिस स्टेशन से में मेट्रो में चढ़ता हूँ, वहां की चेकिंग मशीन खराब थी तो सारी की सारी पुलिस अपने नाजुक-नाजुक हाथों से एक-एक व्यक्ति को चेक कर रही थी. इस चक्कर में भीढ़ इतनी हो गयी की गेट से १ किलोमीटर से थोड़ा कम लंबी लाइन लग गयी. यह तो था एक दिन का बहाना दूसरे दिन आप कह सकतें हैं की आज मेट्रो ही धीरे धीरे चल रही थी. अब आपके बॉस मेट्रो को तो कुछ कह नहीं सकते साथ में वो यह भी जोड़ देंगे की हाँ मैंने देखा था एक मेट्रो स्टेशन पर सच में भीढ़ थी. तो आप तो बच गए.

पर वो लोग नहीं बच पाए जो कई महीनों से मेट्रो में लगे हुए थे साफ़ सफाई के लिए. आखिर उन्हें पुलिस ने पकड़ ही लिया. मेट्रो में भीढ़ बढ़ने से कुछ विशेष व्यवसाय को बढ़ा धक्का लगा है. मैंने कई बार देखता हूँ की रेडलाइट पर सामान बेचने वाले भी मेट्रो का जबरदस्त इस्तेमाल करते हैं. वो किताब, कार स्टीरिंग पर लगने वाली ग्रिप और बहुत कुछ के साथ बड़े आराम से गुड़गांव और दूर-दूर तक ले जाते हैं और रोजाना सफर करते हैं. मेट्रो से जिस धंधे को सबसे ज्यादा चोट लगी है, वो है पॉकेटमारने के बिजनेस को. क्योंकि अब लोग ज्यादा से ज्यादा मेट्रो में सफर करते हैं और मेट्रो में लगभग हर जगह कैमरे लगे हुए हैं तो उनके लिए थोड़ा मुश्किल है. पर कहते हैं ना हर मुश्किल काम हिम्मत करने से ही आसान होता है. तो पॉकेटमारों ने भी हिम्मत करी और बनाने लगे मेट्रो को निशाना.

मुझे मेट्रो में सफर करते-करते करीब ६ महीने हो गए हैं, और इन 6 महीनों में मैंने हर हफ्ते किसी ना किसी का फोन गायब होते देखा है चूँकि में इसका भुक्तभोगी था (देखे मेरा ये अंक) तो अब मैं अपना फोन अपने हाथ में ही ले कर मेट्रो के कोच अंदर जाता हूँ. पर राजीव चौक, सेंट्रल सैकेट्रीएट स्टेशन ऐसे हैं जहां इतनी भीढ़ होती है की हर किसी को मुंबई की लोकल ट्रेन याद  आ जाती है. पर कुछ किया नहीं जा सकता है. मतलब आप मान सकते हैं की तकरीबन  50 फोन से ज्यादा हर रोज मेट्रो से चोरी किये जाते होंगे और मेरे ख्याल से सिर्फ 10या20 की ही FIR  दर्ज होती होगी.
हालाँकि मेट्रो के स्टाफ ने अभी कुछ दिन पहले तकरीबन 30 लोगों को मेट्रो में चोरी करने के लिए पकड़ा. जिसमे अधिकतर महिलाएं थी. सबसे ज्यादा फोन मेट्रो में चढ़ते और उतरते वक्त गायब होते हैं ऐसा मैंने देखा है. यही वो वक्त है जब आपको सबसे सतर्क रहना है पर हम तो ऐसे ही हैं के तर्क पर हम जमे रहते हैं और अपनी जेब खाली करते हैं भरी हुई मेट्रो मैं सवारी करते हैं.

Tuesday, July 5, 2011

कौन हूँ मैं ?


कौन हूँ मैं,
जानता नहीं हूँ,
अँधेरे गर्भ से निकला,
महीनों तक पला,
नाल से किसी से था जुड़ा,
क्यों हुई उत्पत्ति मेरी,
अंजान था मैं, बेखबर
जब प्रकाश ने छुआ मुझे,
ऑंखें हुई छुईमुई,
जुदा कर दिया नाल से मुझे,
फिर भी अंजान रहा बरसों तक,
कौन हूँ मैं ?
,, ब से गुनगुनाता हुआ,
अपनी ही आवाज़ से खुश होता रहा,
तब ना खुद को जानने की समझ थी,
न ही खुद को जानने की ईच्छा,
वक्त के साथ सोचता गया,
कौन हूँ मैं ?
जब हुआ बड़ा,
सोचा अब जानूंगा खुद को,
तब कोई आया जीवन में ऐसा,
जिसने कहा बड़े प्यार से,
जानती हूँ मैं तुम्हे, तुझसे बेहतर
मैंने भी खुद जानने के लिए उसी को सहारा बनाया,
जब भी जानना होता खुद को,
पहुँच जाता उस डगर,
एक दिन वो छोड़ कर चली,
रह गया अकेला तनहा उदास ,
एक बार फिर लग गया जानने में,
कौन हूँ मैं ?
छोड़ कर सब कुछ जीने लगा जिंदगी,
वक्त के साथ लोग गुजरते
कुछ पुराने टूटे तो नए बनते गए,
कोई टूट कर भी जुड़ा रहा, कोई जुड कर भी टूटा रहा,
जिंदगी की इतनी आपाधापी में
खुद को मैंने जाना है,
जीवन जीने आया हूँ, जीवन जी के जाना है,
यही सार है जीवन
यही हूँ मैं ..
फिर भी तलाश मेरी अधूरी सी लगती है...........
खुद को जानने की कसक आज भी दिल में रहती है .....

Wednesday, June 15, 2011

मेट्रो में मैराथन


ये दिल्ली है मेरी जान ! जानते हो क्यूँ ? क्योंकि यहां दिल वालों की मंडली रहती है । हर कोई दिल देने और दिल लेने में लगा हुआ है । कमी है बस तो एक कि टाइम नहीं है किसी के पास और अगर है तो फिर खूब सारा फिर  तक जब तक आप उससे उब नहीं जाते आप उसे छोड़ नहीं सकते । मगर दिल्ली में सब कुछ तेज दौड़ता है, तेज रफ़्तार गाड़ी, उसमें बैठी सवारी, बस और तो और मेट्रो भी दौड़ती है बड़ी तेज ।  
दिल्ली हमेशा से ही नए-नए बदलाव का मुरीद है पर दिल्ली में पिछले कुछ सालों में बड़ी तेज़ी से बदलाव आया है । जब कॉमनवेल्थ गेम्स दिल्ली में होने का हुआ तो बहुत के समझ में आ गया की दिल्ली अब सच में बदलेगी । नई नई बसें, स्टेडियम, गमले, फूल और मिटटी तक बदल दी गयी दिल्ली की और देखते देखते दिल्ली रहने वालों के लिए कहीं स्वर्ग तो कहीं नरक और बाहर वालों के लिए एक सपना हो गयी ।  चीजें महंगी होती गयी और लाइफ सस्ती । जिन्हें कमाना था वो कमा गए जो बच गए वो बचा खुचा समेटते हुए निकल गए । रही सही कसर या यूँ कहें की इज्ज़त बचायी तो भारतीय खिलाड़ियों ने जिन्होंने खूब सारे ईनाम जीते और देश का नाम रोशन किया और मुझे लगता है उसके बाद दिल्ली वालों को खेल की हवा लग गयी है । पूरी दिल्ली खेलनुमा हो गयी ।
लोगों ने खेलों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और दिखा दिया की दिल्ली वालों का दिल प्यार के लिए ही नहीं  ही नहीं मैच के लिए भी बड़ा है । खैर खेल खत्म हुआ और शुरू हुआ उसके बाद खेल के बाद का खेल ।
आज कल खेल में एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है वो है मैराथन का । जब देखो तब कोई ना कोई मैराथन करवाता है और लोग उसमें शामिल होते हैं सन्डे के सन्डे और दौड की दौड़ हो जाती है और कोई गंभीरता से दौड़ गया तो ईनाम अलग से । उसमें उम्र दराज़ से ले कर बच्चे तक शामिल होते हैं ।  मैराथन को एक शानदार सन्डे बनाते है पर ये साल में कभी या एक साथ कई जगह पर होती है, एक दिन छोड़ कार एक दिन. मेट्रो में भी ऐसा ही खेल होता है छोटी मैराथन के नाम से हर रोज । ये अलग बात है की कोई उस पर गौर नहीं करता ।
जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ मेट्रो की जहां रोज छोटी मैराथन होती है । सच मानिए अगर आप मेट्रो में १०० मीटर की रेस का आयोजन करेंगे तो कोई भारतीय ही जीतेगा । बस शर्त ये है की रेस मेट्रो ट्रेन के गेट खुलते ही चालू होगी और मेट्रो के बाहर निकलने वाले गेट तक खत्म होनी है । क्योंकि दिल्ली के बहुत से लोग बाथरूम में १५ मिनट ज्यादा लगा सकते हैं पर मेट्रो के गेट खुलने के बाद वो १० सेकंड भी मेट्रो स्टेशन पर बिताना पसंद नहीं करते । और गेट खुलते ही ऐसे भागते हैं जैसे गेट खुलने पर रेस के घोड़े भागते हैं । पर जैसे ही वो मेट्रो स्टेशन का गेट पार करते हैं वो अपनी सारी फुर्ती फिर मेट्रो की लिफ्ट को पकड़ने में लगा देते हैं । जैसे मैराथन खत्म होने के ईनाम के रूप में उन्हें मिला हो । मेट्रो की लिफ्ट में चढ़ने का मौका इसे क्यों पाना । मुझे ये समझ में नहीं आता कि लिफ्ट का प्रयोग जवान लोग क्यों करते हैं. मैंने कई उम्रदराज लोगों को देखा है कि वो सीढ़ियों का प्रयोग करते हैं. कभी कभी तो पूरी लिफ्ट हट्टे कट्टे पुरुष और महिलाओं से भरी होती है और उम्रदराज लोग बाहर खड़े रहते हैं पर मजाल है कोई लिफ्ट से उतरे. क्योंकि उन्होंने १०० मीटर कि मैराथन में ईनाम जो जीता है लिफ्ट से जाने का लाइसेंस । 

Friday, May 27, 2011

इश्क-विश्क और फेसबुक

मेट्रो अपने एक तरह की माया नगरी है जहां हर कोई कलाकार है और वही उसका निर्देशक है. हर रोज एक नई फिल्म लिखी जाती है और उस पर काम होता है । जिसमे मेट्रो एक बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल निभाता है । क्योंकि मेट्रो प्यार की नई फ़सल वालों के लिए सबसे अच्छे अड्डे बनते जा रहे हैं । कन्धों पर बैग के साथ में दिल में तमाम सपनों को लिए ये रोज मेट्रो में सवार होते हैं और निकल पड़ते है एक नई मंजिल की तरफ । मेट्रो के एसी कोच की हवा खाते और खुद को बस की गर्मी में लू से बचाते, सीढियों पर बैठ पर घन्टों बतियाते , हर रोज नए सपनों को बुनते है । 

ये नज़ारा मेट्रो के हर स्टेशन का है, जहां पर बड़े आराम से ऐसा देख सकते हैं । मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर आधे से ज्यादा जगह पर इनका कब्ज़ा होता है और इनको किसी और की कोई फिक्र नहीं होती. बस फिक्र होती है तो अपने प्यार की । 
जब ये सीढ़ियों से निकल कार मेट्रो के डिब्बे में जाते हैं तो इश्क का बुखार वहां भी कम नहीं होता, कोई किसी को ले कर सीट पर ऐसे बैठता है जैसे दिन दुनिया में उसे देखने वाला कोई नहीं है । तो कोई खड़े खड़े ही इश्क की इबादते पढ़ने लगता है । आज कल एक नया ट्रेंड देखने को आया है पहले लोग इधर-उधर की या पड़ोस में रहने वाले / वाली की बात करते थे आज कल फेसबुक का जमाना है हर कोई फेसबुक की बात करता है । और बाखुदा अगर वो इस बला वेबसाइट से नहीं जुडा हुआ है तो आपको ऐसे देखेंगे जैसे अपने घोर पाप कर दिया है । आप ज़िल्लत से बचने के लिए घर जाते ही जुड जाते है और अगले दिन अपडेट करते है I m on Facebook. फिर सिलसिला शुरू होता है दोस्ती का और फेसबुक से मोहब्बत का । 


कुछ ऐसा ही नज़ारा, कुछ दिन पहले मेट्रो में देखने को मिला । एक लड़का और लड़की बड़े आराम से बात कर रहे थे पता नहीं किधर से बात फेसबुक पर आ कर रुक गयी । फिर क्या था लड़का पहले लड़की को समझा रहा था कि किसी अंजान को add मत किया करो, सबसे बात मत किया करो, ये फेसबुक अच्छी चीज़ नहीं है । लड़की बड़ी देर तक सुनती रही जब उसका मन भर गया तो उसने शुरू किया की, तुमने फेसबुक पर 2 अलग अलग नाम से प्रोफाइल क्यों बना रखी है, तुम रोज नई-नई लड़कियां को फ्रेंड बनाते हो मैंने कभी कहा । अब तो लड़के का चेहरा देखने वाला था । उसने बोला how you know ?? लड़की बड़े प्यार से बोली की जिस जुली को कल तुमने अपना नंबर दिया ना वो मैं ही थी । अब तो लड़का शर्मशार हुआ जा रहा था । पर जैसे चोट खायी हुई नागिन अपना बदला लेती ही है उसी तरह गर्ल फ्रेंड से चोट खाया बॉय फ्रेंड बदला जरूर लेता है । वो भी लड़की पर बरस गया की, मुझे पहले ही शक था की तुम ऐसा करती हो और तुम्हे ही पकड़ने के लिए मैंने ऐसा किया था । जब ये सुना तो मेरी हँसी नहीं रुकी । तभी किसी लड़के का फोन आया ... लड़के ने पूछा कौन था ? लड़की बोली फेसबुक फ्रेंड है । अब तो लड़के का पारा 104 पर था । फिर क्या क्या तू-तू मैं-मैं होती रही । इतिहास में की गयी कोई भी गलती का आज हिसाब-किताब और कच्चा चिटठा खुलता गया, एक-एक कर के । कभी लड़की शर्मिंदा होती तो कभी लड़का । खैर ऐसा करीब 45 मिनट तक चला होगा । फिर दोनों फेसबुक पर बहस करते करते उतर गए । 



मुझे लगता है फेसबुक आज कल चर्चा का मुद्दा है । जहां 4 लोग जुटते है वहीँ उसकी चर्चा होती है । वैसे मैं भी इससे अजीज आने वाला हूँ पर क्या करू 70फैन्स है ........

Thursday, May 5, 2011

मेट्रो महिला कोच : कोच एक, फायदे अनेक ।


मेट्रो में अब रोज सफर होता है, जो हर रोज इंग्लिश के सफर में बदलता है । क्योंकि हर कोई एक ही मेट्रो में जाना चाहता है क्योंकि उसे सबसे पहले जाना है और ऑफिस में शायद बॉस की डांट से बचना है । इसमें पुरुष तो पुरुष महिलाएं भी पीछे नहीं है ।  वो भी भाग-भाग कर पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर मेट्रो पकड़ती है और फिर महिला सीट पर बैठे हुए किसी पुरुष को ढूंढती है जिसे वो बड़े प्यार से एक्सक्यूज मी कह कर, अपने लिए आरक्षित की गयी सीट पर बड़ी ही इत्मीनान से बैठ जाती है, और हम अर्थात पुरुषों को मन ही मन में ठेंगा दिखाते हुए बोलती होंगी ‘हें बड़े आये थे बैठ कर जाने वाले अब जाओ खड़े हो कर’ ये कुछ ज्यादा तो नहीं हो गया खैर कोई नहीं   महिलाओं की टक्कर महिलाओं से ही है ।  मेट्रो ने भी बड़ी चतुराई से महिलाओं के लिए एक अलग कोच को लगा कर अपनी कमाई में भी इजाफा कर दिया ।  

कमाई का अंदाजा मेट्रो ने पहले ही लगा लिया होगा, क्योंकि उनको पता है हम भारतीय कैसे हैं, हमें तांक-झांक करने की गम्भीर बीमारी ही नहीं बल्कि ये हमें विरासत में मिला है । तो उन्होंने साथ में कई तरह से दंड भी बना दिए जैसे महिलाओं के कोच में पुरुष दिखा तो समझो नपा अर्थात जुर्माना या सज़ा । और साथ में कई इसी तरह से कई नियम पर उनको ये नहीं पता था की भारतीय जुगाड़ भिड़ाने में, जुगाड़ शब्द सोचने वाले से भी ना जाने कितना आगे निकल गए हैं । उन्होंने इसके भी कई तोड़ निकाल लिए हैं । पूरी मेट्रो में सबसे रौनक वाला डब्बा होता है महिलाओं का कोच । यह कोच एक तरह से अब वरदान हो गया है और शायद अब कोई साधु या आज का युवा अगर तपस्या करेगा तो यही मांगेगा की मुझे एक साल तक महिला कोच में जाने का पास दे दो या मुझे महिला कोच का इंचार्ज बना दो ..या कुछ ऐसा ही ........

खैर लोग मेट्रो में महिला कोच से जुड्ने वाले डब्बे के साथ टेक ऐसे लगते हैं जैसे जब भी उम्मीद जगी उनका ही नंबर आयेगा । हर पुरुष की वो सबसे पसंद की जगह है, वह जगह एक सिनेमा हाल के बालकॉनी की तरह है जिससे सब कुछ साफ़ और पूरा कोच दिखता और आप सभी को और सब आपको देख सकते हैं । कुछ बाँकें छोरो का वो पक्का अड्डा है जिसके लिए वो कभी-कभी मारा मारी और जुर्माना देने तक को तैयार रहते हैं, पर खड़े वहीँ होना है बालकॉनी में । कुछ प्रेमी जोड़ों का भी वो अच्छा अड्डा है लड़की अपने कोच में और लड़का अपने कोच में, नियम का पूरी तरह से पालन करते हुए प्रेम के धागे में मोती पिरोते हैं । और उतरने से पहले पहन भी लेते हैं । और उनको देख कर बहुतों का दिल और ना जाने क्या क्या जलता है ।

कारण जो भी हो इससे महिलाओं का मेट्रो में जाना बढ़ा है तो पुरुषों की संख्या में भी बड़ी तेज़ी से बढ़ी है जो उनके पीछे-पीछे कंही भी जाने को तैयार हैं । अब देखना ये है की मेट्रो इसको कितना कैश कर पाता है या इसकी देखा देखी भारतीय रेलवे भी ऐसा ही प्रयास करता है क्या......
प्रयास कोई भी करे पर फायदा तो दोनों पक्ष को हुआ है और दोनों पक्ष मिल कर मेट्रो को मालामाल करने में लगे  हुए हैं । मेट्रो में महिला कोच के चलने से ना जाने कितनों की फायदा हुआ है । और जब भी वो ठसाठस भरी हुई महिला कोच को देखते हैं तो बस देखते रहते हैं और फ्री में वरदान मांगने का सपना देखते हैं । 

Tuesday, April 12, 2011

कोई सोया नहीं रात भर..


जागती ऑंखें बताती हैं...कोई सोया नहीं रात भर,
याद करता रहा तारे गिन, वो रात भर
बिस्तर की सिलवटें कहती हैं...कोई सोया नहीं रात भर,
गिनते रहे करवटों का बदलना, वो रात भर ।
किताबों में रखे गुलाब बताते है...कोई सोया नहीं रात भर,  
मुरझाये फूलों से पाते रहे खुश्बू का अहसास, वो रात भर ।
खतों कि सूखी स्याही बताती हैकोई सोया नहीं रात भर,
यादों के हर पल को शब्द बनाकर जागते रहे, वो रात भर ।
कमरे का स्याह रंग बताता हैकोई सोया नहीं रात भर,
ख़ामोशी पर भी आवाज़ का अहसास पाते रहे, वो रात भर
उनके साथ बिताये हर पल बताते हैं...कोई सोया नहीं रात भर,
उनकी छुअन का अहसास महसूस करता रहा, वो रात भर ।  

Tuesday, March 29, 2011

क्या है जिंदगी ?


उलझी हुई डोर सी लगती है कभी,
हर सुलझती गाँठ से उलझती है जिंदगी.
क्या कहू तुझे ऐ जिंदगी, 
हर पल समझता हूँ तुझे फ़ना जिंदगी.
बहुत कुछ सीखा है तुझसे,
गिर कर उठना, फिर चलना है जिंदगी.
जब सोचा बहुत हुआ अब और नहीं, 
हिम्मत करके लड़ना है जिंदगी.
मुक्कदर में लिखा है मिलेगा, 
ना मिले गर तो लड़, वो भी पायेगा जिंदगी.
साहस को तपा कर और बन साहसी, 
फिर बोल कहाँ है जिंदगी.
कर सामना हर मुश्किल, 
जो हार गया तो क्या है, फिर उठ अभी भी बाकी है जिंदगी.
सोचता हूँ की होगा अब कुछ नया, 
उसी पल नए करवट लेती है जिंदगी.
हर बार नए कदम बढाता, 
सोच कर यही की अब तो बदलेगी जिंदगी.
जिऊंगा ऐसे कि मैं ना याद रखूं,
जिंदगी कहे वह क्या जी जिंदगी.

Friday, February 18, 2011

मासूम बचपन


मेरे और मेरे भतीजे अरनव के बीच ऐसा होता है, तो सोचा सब चीजों को शब्दों के रूप में आपके सपने प्रस्तुत कर दूँ । आशा करता हूँ मेरा ये प्रयास आपको अच्छा लगेगा ।
               मासूम बचपन 
चंचल आँखों के नए सपने, हर रोज खिलौनों से खेले ।
अपनी हर बात को मनवाती, तेरी ये मासूम ऑंखें ।
हर सवाल जवाब बन जाता, तेरा हर सवाल और बड़ा हो जाता ।
मन मार कर या दिल को समझाकर, होता वही जो तेरा मन चाहता ।
जब तेरी नटखट चाल को देखता, बस मुस्कुरा कर गले लगाता ।
३ के बाद ५ सुनाता, ऑंखें दिखाने पर ४ दोहराता ।
घोड़ा बनवा कर पीठ पर चढ़ता, इंडिया गेट और मॉल घुमवाता ।
दादी से होती हैं सारी बातें, हम पूछे तो फिर बस सुनता जाता ।
रात को इनका सूरज उगता, बिस्तर पर हैं तारे गिनता ।
खाने से इनका बैर है रहता, मूड में हो तो रसोगुल्ला है चलता ।
ऑटो को जब ओटो कहता, पलट-पलट कर मम्मी को देखता ।
खेल-खेल मैं खाना खाता, खाते-खाते खेल है खेलता ।
नंगा हो तो हाथ लगाता, देख लिया –देख लिया खुद ही चिल्लाता ।
पहन कर नए टिप टॉप कपड़े, अकड़ कर चल कर दिखाता ।
देख कर तेरा हँसता चेहरा, पूरे दिन की थकान भूल जाता ।
कैलकुलेटर को मेज़ पर रख कर, मेरा भी है लैपटॉप बताता ।
ऑफिस को घर के बाहर छोड़ कर, मैं भी तेरी दुनिया में खो जाता ।  

Tuesday, February 8, 2011

लाल बत्ती का बाजार, बचत का भंडार


कहते हैं बड़े-बड़े शहर कभी नहीं सोते पर मैं कहता हूँ वो जागते हैं आपने सपने पूरा करने के लिये । क्योंकि वो हर समय अपनी धुन में रहते हैं । और सब के सब अपने सपने को पूरा करने के जुगाड में लगे रहते हैं । इसलिये घर में लोग कम हो रहे हैं और रोड पर बढ़ रहे हैं जाने किसकी तलाश में भटक रहे है । हर रोज़ नये नये बाहन रोड पर आ रहें हैं, नई नई मोटरसाइकिल रोज़ आपके आगे से धुआं निकलते हुए बड़ी तेज़ी से निकल जाती है और आपको लगता आर ये वाली बाइक कौन सी आ गई अभी तक तो नहीं देखी थी । चलो कोई नहीं फिर ठीक से देख लेने की तमन्ना लिये हम आगे बढ़ जाते हैं । आप चाहे किधर भी जाये आप मोटरों के धुएं से नहीं बच सकते । बस में तो हालत और विचित्र होती है क्योंकि वो चोडी ज्यादा होती है तो छोटे छोटे रास्तों से निकल नहीं पाती है और जबरन जाम का शिकार होती है और उसके पीछे लग जाती है लंबी लाइन  फिर चाहे कारण गलत दिशा में लगी मोटरसाइकिल ही क्यों न हो । पर उसे लगता है की वो सही जगह पर लगी है ।

अगर आप कार से सफर करते है तो आपको लाल बत्ती पर रुकना अक्सर बेकार लगता होगा क्योंकि जैसे ही रेड लाइट होती है और कारें या बाइक रूकती है आपके पास मौसम और समय के हिसाब से दुकानदार आते हैं । ये मेरे ख्याल से विश्व का पहले बाजार होगा जहाँ दूकानदार ग्राहक के पास आते हैं । मसलन अगर मौसम सर्दी का है और ठण्ड ज्यादा है जो ग्लब्स वाले, गरम टोपी वाले आपके पास आते हैं । और अगर क्रिसमस हो तो लाल टोपी वाले और आपके पास से इस तरह से गुजर जाते हैं जैसे की आपको उन्होंने लालच दिया है लो न लो कम से कम देख तो लो। और वो बच्चों को विशेष रूप से अपने और आकर्षित करते है मुझे उनका यह स्टाइल बड़ा पसंद आता है । वो बच्चे को देख कर उसे खिलौने या गुब्बारे से ललचाते है और जब उनके माता पिता देखते है तो वो मुहं किसी और तरफ कर लेते है । और यही क्रम २-३ बार होता है और लो सामान बिक गया । रोड उनका शोरूम बन जाता है वहीँ पर सब कुछ चलता है खुले आसमान के नीचे बिलकुल बिंदास । आपको हर वो जरूरत की चीज़ मिल जायेगी जो आपके काम की है । अगर आप कार वाले है तो कार का सामान, बाइक वाले भाई को बाइक का सामान । एक बार की बात है मैं बाइक से कंही जा रहा था मेरी गाड़ी रेड लाइट पर रुकी तो एक जनाब मेरे पास आये और बोले आपको बाइक का टायर चहिये तो आगे वाली पंचर की दुकान पर आ जाओ सही भाव में दे दूँगा । मैं बस उसे देखता रह गया । हर शनिवार को भगवान आपके कार और बाइक के पास आते हैं और आपका भला कर के चले जाते है और जिनके हाथ में भगवान होते हैं वो शनिवार छोड़ कर भीख या कुछ और काम करते हैं । पर शनिवार को भगवान को याद दिलाना नहीं भूलते की आज शनिवार है ।  कुछ रेड लाइट रात में रेड लाइट का ही अड्डा बन जाता है । रेड लाइट वाले दूकानदार और ग्राहक की निगाह मेरे ख्याल से किसी और दुकान दार से ज्यादा तेज और चालक होती है । उनकी सारी कमाई उस पर निर्भर जो करती है । 1 मिनट की रेड लाइट में बेचना भी है और दिखाना भी है फिर पसंद आने पर पैसे भी काट कर लौटाने हैं । तो ऐसा फुर्ती से काम बस मुझे लगता है लाल बत्ती के सेल्समैन ही कर सकते हैं खुद रोकेट सिंह भी नहीं कर सकता है । 

इसका अंदाज़ा आज से बहुत पहले मधुर भंडारकर को हो गया और उन्होंने कुछ हज़ार या कहे कुछ १०० रुपये प्रतिदिन कमाने वाले लोगो पर एक फिल्म ही बना डाली । ट्रैफिक सिग्नल करके पर उन्होंने वो दिखा दिया जो होता है ।  और वाह वाही लूटी वो अलग से । इसका अंदाज़ा शायद पेट्रोल  बेचने वालों को भी गया है और साथ में मार्केटिंग वालों को भी क्योंकि अब रेड लाइट पर जिस तरह से प्रचार तेज़ी से शुरू हो गया है उसे देख कर लगता है की वो दिन दूर नहीं जब एक दिन मैक-डोनाल्ड वाले रेड रेड लाइट स्पेशल बर्गेर और कोक बेचते नज़र आएंगे । जिस प्रकार सड़क पर वाहनों की रफ़्तार बढ़ रही है मुझे ये दिन दूर नहीं लगता है ।  अब तो मैंने एक होर्डिंग देखी की रेड लाइट पर बचाइए 100 रुपये प्रतिमहीना । मतलब 1200रुपये प्रति वर्ष। आपको करना ये है की आपको बस रेड लाइट पर अपनी गाड़ी बंद करनी है । लो कर लो बात पर उन्होंने ये नहीं सोचा की अगर रेड लाइट पर ज्यादा देर खड़ा रहा तो हो सकता है कुछ न कुछ प्रतिदिन खरीद सकता हूँ जो महीने से 100 रुपये से ज्यादा महंगा हो सकता है । खैर ये तो अपने अपने इच्छा पर भी निर्भर करती है पर मुझे रेड लाइट पर कभी कभी चिक्की खाना बड़ा पसंद है । 

Tuesday, January 25, 2011

दस्तक


दिल पर दस्तक दे रहा है
तेरा कोई,
पूछता हूँ तो कहती है
मैं तेरा ही साया हूँ,
एक बार फिर तुझसे
मिलने आयी हूँ,
क्यों छुपता है मिलने से
तुझे हाल बताने आयी हूँ,
जिस्म पर न सही
दिल पर तेरा आज भी कब्ज़ा है,
बस दूर हूँ तुझसे
ये खता हमारी है,
ऑंखें बंद करू तो
चेहरा आज भी तेरा देखती हूँ,
पुरानी यादों का किस्सा
आज भी चलता है,
वो मेरी बात पर
हौले से मुस्कुराना,
ना चाहते हुए
मेरी बात मानना,
मेरे बालों के साये मे
तेरा गुनगुनाना,
तेरा मेरे लिये
नये नये शब्द बनाना,
जाड़े की सुनहरी धूप में
तेरा यादों का ताना-बाना,
आज भी उन्हें सोच कर
दिल का किसी कोने मे मुस्कुराना,
सोचती हूँ वो रात दुबारा आ जाये
तेरे आगोश की महक फिर ताज़ा हो जाये,
तू मुझे बेवफा कहे
या कुछ और नाम दे,
पर मेरी वफ़ा का नाम आज भी तू है
तुझे छोड़ कर
तेरे साथ ही जीती हूँ,
तू मेरे साथ नहीं तो क्या
मेरी यादों में तू हरपल रहता है,
दस्तक दे रही हूँ
अब तो दरवाजे खोल दे,
बिना पूछे आज भी
नहीं आना चाहती,
रूह बन गई तो क्या
आज भी तेरी आदतों से वाकिफ़ हूँ,
तेरी याद आज भी मुझे
बांधे रखती है,
वो खुशबू का साया मैं हूँ
जो कभी-कभी तेरे पास से गुजरता है,
बन कर झौंका हवा का
आज भी तुझे महसूस करती हूँ,
तेरे आगोश की कशिश में
सिमटने के लिये आज भी तड़पती हूँ ।

©csahab

Wednesday, January 5, 2011

यादों का घरोंदा

आपके लिये कुछ लिखा है, 
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ना नज़रे मिलाते है न झुकाते हैं,
देख कर उन्हें बस देखते जाते हैं ।
ना बोल पाते है न चुप हो पाते हैं,
देख कर उन्हें बस गुनगुनाये जाते हैं ।  
ना कुछ लिख पाते हैं न कुछ मिटा पाते हैं,
देख कर उन्हें बस लकीरें खींच पाते हैं ।  
ना चल पाते हैं न बैठ पाते हैं,
देख कर उन्हें ठगे से रह जाते हैं ।  
ना पास आ पाते हैं न दूर जा पाते हैं,
उनसे नज़रे मिला कर झुका जाते हैं ।
ना जाग पाते हैं न सो पाते हैं,
उनकी यादों में मदहोश हो जाते हैं ।
ना हँस पाते हैं न रो पाते हैं,
मुकुराते हुए मेरे आंसू बाहर आते हैं ।
ना मिलने कि खुशी न खोने का गम खाते है,
उनकी यादों को सीने मे जलाते हैं ।
ना सुन पाते हैं न समझ पाते हैं,
पर उनकी होंठों कि चाल समझ जाते हैं ।  
ना चाँद से न सूरज से दोस्ती जताते है,
मेरी तो बस उनसे है हस्ती यही बताते हैं ।
ना राम जपते हैं न रहीम पढ़ते हैं,  
दिल कि गहरायी मे वो बसते हैं ।
ना इंकार करते हैं न इकरार करते हैं,
उनके साथ वक्त बिताने का इंतज़ार करते हैं ।
ना उनका नाम लेते हैं न बदनाम करते हैं,
अपने जेहन मे चर्चा-ए-आम करते हैं ।  
ना काश करते हैं न उफ्फ करते हैं,
जितने पल बिताये साथ मे आज भी महसूस करते हैं ।   
ना डूब पाते हैं न तैरना सीख पाते हैं,
प्यार में दौर ऐसे भी आते हैं ।
ना उड़ पाते हैं न गिर पाते हैं,
प्यार को देख कर दूर से रो जाते हैं ।
ना सांस आती है न सांस जाती है,
बस और बस उनकी याद आती है ।
©csahab