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Wednesday, June 13, 2018

मेट्रो में चीन की दीवार

मेट्रो में चीन की दीवार 

बात उन दिनों की है जब हम छोटे हुआ करते थे... उस समय मेरे मामा मुझे बातों बातों में बताया था की दुनिया सिर्फ एक ही चीज़ है जो अंतरिक्ष से भी दिखती है और वो है चीन की दीवार. ये बात सुन कर मानो लगा की क्या कोई दीवार इतनी बड़ी हो सकती है की आसमान से भी दिख सके. उस समय से अब तक ये बात मेरे ज़ेहन में बसी हुई है, कि कोई दीवार इतनी बड़ी है की वो राकेट में बैठे किसी को इतनी आसानी से दिख जाती है. फिर क्या था, उसके बाद तो जहाँ जहाँ तहां में चीन की दीवार के बारें में जानने में रूचि दिखाने लगा. इसको किसने बनाया, कब बनाया इत्यादि. 
 the Great wall of china

खोजबीन करते करते उम्र भी बढ़ती गयी.. पर चीन की दीवार के प्रति उत्सुकता आज भी उतनी ही बनी रही. ये जब अमिताभ बच्चन की दीवार का पोस्टर देखा तो लगा शायद इसमें भी वो दीवार दिखाएँ. पर यहाँ तो संबंधों की दीवार ने मेरा चीन की दीवार देखने का सपना टूट गया. जिस फिल्म में  दीवार का ज़िक्र होता मुझे लगता इसमे पक्का चीन की बात होगी. इस चक्कर में कुछ B ग्रेड फिल्मों को देखने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ क्योंकि उनके नाम में दीवार का ज़िक्र था( अनुरोध है उनके नाम आप न पूछे ).  उसके बाद चीन की दीवार को देखने का सौभाग्य कराटे किड नाम की मूवी में हुआ.. जिसमे जैकी चैन गुरु बनके अपने चेले को कराटे की शिक्षा दे रहे थे.

The karate kid
कुछ ऐसा ही एक सीन चांदनी चौक से चाइना नाम की फिल्म में अक्षय कुमार अपने गुरु से ट्रेनिंग लेते हुए दिखे... इन दोनों फिल्मों को देखने का शायद एक कारण दीवार भी रही होगी. क्योंकि सिर्फ समय ही बदला था उत्सुकता नहीं. कभी कभी तो लगता है कि उसकी एक ईंट भी मिल जाये तो ज़िन्दगी बदल सकती है. पर सोचते सोचते मेट्रो के सफ़र ने मेरी ज़िन्दगी बदल दी.
हुडा सिटी सेंटर में शाम को बढ़ी मुश्किल से धक्का मुक्की करके बैठने की सीट हासिल की. और दीवार से चिपक कर बैठ गया. शायद इसी भीड़ से लड़ाई करके एक लड़की भी मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गयी थी. बड़ी बड़ी ऑंखें, आँखों में काजल,बालों में करीने से लगाया गया बैंड, चेहरे पर चमक बिलकुल भी एहसास नहीं दिला रही थी कि मोहतरमा पूरे दिन ऑफिस के कामकाज को निपटा कर आ रही हैं. खैर मुझे क्या करना में तो सफ़र के दौरान के सुखद एहसास से खुश था. पर जैसे जैसे मेट्रो के स्टेशन आते गए मोहतरमा ईद का चाँद होती गयी. और 4 स्टेशन के बाद तो उनके और मेरे बीच इतनी बड़ी दीवार खड़ी हो गयी जो शायद चीन के दीवार से भी बड़ी थी. 

Thursday, July 25, 2013

लघु कथा "दीवार"

दीवार


जब दीवार का जिक्र होता है तो पता नहीं क्यों मुझे मेरे गाँव की याद आ जाती है. मेरे दादा जी के समय की वो दीवार. जो हमे अनायास ही देखती, हमारी हर हरकतों को ऐसे देखती कि अभी बोल देगी हमारी सारी शरारतें अम्मा को. वो दीवार हम सब भाई बहनों को कभी कभी इतनी बेबस दिखती कि हम उससे अक्सर अपने कपड़ों से साफ़ कर दिया करते थे, पर उसके हालत पर कोई असर नहीं होता था. बरसात में उसके उपर पानी ऐसे जैम जाता मानो जैसे बरसात के बाद गेंहूँ की बालियों पर पानी जमा हो, जैसे पेड़ों की पत्तियों के मुंह पर पानी जमा हो, जैसे किसी गड्ढे में पानी जमा हो. और जब तक कोई उसको न हिलाए वो पानी वहीँ रहता है. वो दीवार भी शायद हमारा ही इंतजार किया करती थी कि हम आयें और उसके उपर पानी की चादर को हाथों से साफ़ करें.  और फिर हम उस दीवार के सिराहने खेलने लगते. फिर एक बार जब हम गर्मियों की छुट्टियों में गाँव आये तो हमे वो ख़ुशी न मिली. अब वो बूढ़ी दीवार अपनी जगह नहीं थी. उसकी जगह एक नयी दीवार ने ली थी. और उस पर अब पानी भी नहीं टिकता था.