ads

Translate

Tuesday, January 12, 2016

चलो उठो फतह करो

बहुत दिनों के बाद कुछ प्रस्तुत कर रहा हूँ, आशा करता हूँ आपको ये रचना पसंद आएगी. 


चलो उठो फतह करो.

हौसलें बुलंद कर 
सीने को ज्वाला से 
भर मार्ग तू प्रशस्त कर.
चलो,उठो,फतह करो.


चेहरे पर मुस्कान लिए
भीतर एक तूफ़ान भर 
ज़ज्बे से विरोधी को परास्त कर.  
चलो,उठो,फतह करो.


हौसलों के पंख खोल 

औरों से ऊँची उड़न भर
हर चुनौती पार कर. पार कर.
चलो,उठो,फतह करो. 

चापों से चट्टान हिले
नदियों की रफ़्तार थमे 
रोम-रोम से ललकार कर
चलो,उठो,फतह करो.

गरज बरस हुंकार भर
लक्ष्य पर प्रहार कर
रण को अपने नाम कर.
चलो,उठो,फतह करो.

कॉपीराइट +Vipul Chaudhari 

Thursday, July 25, 2013

लघु कथा "दीवार"

दीवार


जब दीवार का जिक्र होता है तो पता नहीं क्यों मुझे मेरे गाँव की याद आ जाती है. मेरे दादा जी के समय की वो दीवार. जो हमे अनायास ही देखती, हमारी हर हरकतों को ऐसे देखती कि अभी बोल देगी हमारी सारी शरारतें अम्मा को. वो दीवार हम सब भाई बहनों को कभी कभी इतनी बेबस दिखती कि हम उससे अक्सर अपने कपड़ों से साफ़ कर दिया करते थे, पर उसके हालत पर कोई असर नहीं होता था. बरसात में उसके उपर पानी ऐसे जैम जाता मानो जैसे बरसात के बाद गेंहूँ की बालियों पर पानी जमा हो, जैसे पेड़ों की पत्तियों के मुंह पर पानी जमा हो, जैसे किसी गड्ढे में पानी जमा हो. और जब तक कोई उसको न हिलाए वो पानी वहीँ रहता है. वो दीवार भी शायद हमारा ही इंतजार किया करती थी कि हम आयें और उसके उपर पानी की चादर को हाथों से साफ़ करें.  और फिर हम उस दीवार के सिराहने खेलने लगते. फिर एक बार जब हम गर्मियों की छुट्टियों में गाँव आये तो हमे वो ख़ुशी न मिली. अब वो बूढ़ी दीवार अपनी जगह नहीं थी. उसकी जगह एक नयी दीवार ने ली थी. और उस पर अब पानी भी नहीं टिकता था. 

Friday, May 10, 2013

रंग


रंग

वो कहते हैं मैं बदनाम हो गया हूँ,
उनकी गली में आम हो गया हूँ.

मेरा आना भी उन्हें नागवार गुजरता है,
उनके दरीचे का पर्दा भी नया लगता है.

छत के फूल भी अब मुरझाने लगे हैं,
सीढ़ियों पर भी अब जाले लगने लगे हैं.

बदल दिया है समय आने जाने का,
नज़र मिलने पर भी रंग अब बदलने लगे हैं.

Copyright @csahab