बस की एक अनोखी यात्रा

मार्च 26, 2010

कल मैं थोडा उदास टाइप था ।  बार बार यही सोच रहा था बस मैं बैठे आधे घंटे हो गए अब तक कुछ नहीं हुआ नया नया ब्लॉग लिखना स्टार्ट किया है । मेरे ब्लॉग करियर को तो ब्लोगारिया रोग लग जायेगा । पर धन्य हो बस देवी और लोंगो का गुस्सा मेनेजमेंट । जरा सा छू दो तो तुरंत स्टार्ट हो जाते है । जैसे वो इंतज़ार ही कर रहे हो उस बात का । उनकी चाभी भरी रहती है जब वो ऑफिस से निकलते है की आज किसी ने छुआ भी तो सारी की सारी आग उनपर ही उगल दूँगा । मैं भी बड़ा प्रयास करता हू की उनकी तरह गुस्सा करू पर मैं नहीं कर पता । कल का मुद्दा ये था की एक नवयुवक बस मैं चडा वऔर लपक कर जल्दी जल्दी ड्राईवर के पास जा कर खड़ा हो गया । मुझे आज तक समझ मैं नहीं आया है की कुछ लोंगो को ड्राईवर के बगल मैं बैठ कर यात्रा करना क्यों अच्छा लगता है । जबकि मैं बहुत जगह देखा है ड्राईवर को ऐसा बिलकुल पसंद नहीं पर अगर इंसान मान गया तो वो इंसान कैसा तब तो वो भी जानवर हुआ न । अरे मैं उस नवयुवक की बात कर रहा था तो वो वहा पर खड़ा हो कर यात्रा करने लगा । अचानक ही बमका बमकी के मधुर सुर चरो तरफ़ खिलने लगे । हुआ कुच एसा था कि नवयुवक अपने से बुजुर्ग का सहारा ले लिया था । बस पूरे बस मे दोनो छा गए । छोटा बड़े को बड़ा छोटे को सम्मान की बात समझाए । और मैं उनकी बात को याद कर रहा था की कल मुझे क्या क्या लिखना है । अब तो बस में कुछ चीजे आम हो गयी है जैसे की मुझे बस थोडा थोडा पता होता है कौन सी सीट से कब कान्हा उतरेगा और कब मुझे सीट मिलेगी । कुछ तो इतने एक्सपर्ट है की पूछिए मत । पर मुझे एस बात का बड़ा अफ्सोस है की उनकी बाता बाती ज्यादा देर नहीं चली और बस मैं बस में बड़ी जल्दी ही माहौल शांत हो गया । में बड़ी अंदर से थोडा प्रसन्न और थोडा उदास था । प्रसन्न इसलिए की माहौल शांत हुआ और उदास इसलिए की मेरी कहानी अभी बाकि थी क्योंकि पता नहीं अचानक क्या हुआ दोनों एक साथ अपने आप शांत हो गए । शायद उनको मेरे लेखन के बारे मैं पता तो नहीं चला गया । खैर मेरा स्टैंड आ गया था पर उनका नहीं । 

You Might Also Like

0 टिप्पणियाँ

Subscribe